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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 20

 


 जिला रोहतास में स्कूल नियुक्ति की कहानी — भाग 20

कोई पूछे तो कहना, मुसाफ़िर तो गया

दोस्तों,
यह पंक्ति मेरी सेल्फ स्टोरी के 19वें भाग की आख़िरी कड़ी थी।
सासाराम, जिला रोहतास, बिहार से स्थानांतरण होकर मैं अपने गृह ज़िला दरभंगा आ गया। इस समय मैं उर्दू मिडिल स्कूल करहटिया, जिला दरभंगा, बिहार में कार्यरत हूँ।

इसी दौरान मेरे मन में ख़याल आया कि अपनी ज़िंदगी के अब तक के सफ़र को एक ब्लॉग के माध्यम से आप सभी के सामने रखा जाए। शायद मेरी ज़िंदगी की कुछ घटनाएँ किसी के लिए प्रेरणा बनें, किसी को हौसला दें और किसी को अपने बीते हुए दिनों की याद दिला दें।
इसी सिलसिले में मेरे दो पुराने स्टूडेंट्स का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है।
इन दोनों बच्चों को मैंने उनकी प्रारंभिक शिक्षा दी थी। आज दोनों इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अच्छे पद पर कार्यरत हैं। उनमें से एक हैं मोहम्मद शकील, पिता मोहम्मद सय्यूम (नांगलोई, दिल्ली) और दूसरे हैं अब्दुल क़ादिर, पिता मोहम्मद साबिर (नांगलोई, दिल्ली)।
जब इन दोनों ने मेरी इस जीवन-कथा को ब्लॉग पर पढ़ा तो वर्षों बाद मुझे मैसेज किया। उन्होंने न सिर्फ़ मुझे बधाई दी, बल्कि बड़े प्यार से एक शिकायत भी की—
“सर, आपने दिल्ली के सफ़र का ज़िक्र ही नहीं किया।”
उनकी यह बात मेरे दिल को छू गई।

फिर मैंने सोचा कि जिस सफ़र में मेरी ज़िंदगी के कई महत्वपूर्ण वर्ष बीते हों, जिस सफ़र ने मुझे पढ़ाने का पहला अनुभव दिया हो और जहाँ मुझे इंसानियत और मोहब्बत के कई खूबसूरत चेहरे देखने को मिले हों, उस सफ़र को भला कैसे भुलाया जा सकता है?

बस, उन्हीं दोनों बच्चों की फ़रमाइश पर अपनी इस कहानी में एक और अध्याय जोड़ रहा हूँ।

माँ के पेट में बच्चा

कभी-कभी ज़िंदगी को समझने के लिए हमें उसके बिल्कुल आरंभ से शुरुआत करनी पड़ती है।
जब तक बच्चा माँ के पेट में रहता है, वह दुनिया की तमाम परेशानियों से बेख़बर होता है।
माँ खाती है तो उसका पेट भरता है।
माँ सोती है तो उसे सुकून मिलता है।
माँ चलती है तो वह भी उसी सफ़र का हिस्सा बना रहता है।

न उसे रोज़गार की चिंता होती है, न पढ़ाई की, न भविष्य की और न ही दुनिया की किसी परेशानी की।
लेकिन जैसे ही बच्चा माँ के पेट से बाहर आता है, ज़िंदगी की असली कहानी शुरू हो जाती है।
थोड़ा बड़ा हुआ तो पढ़ाई की फ़िक्र।
स्कूल पहुँचा तो परीक्षा की चिंता।
स्कूल से निकला तो कॉलेज और करियर की चिंता।
पढ़ाई पूरी हुई तो नौकरी की तलाश।
नौकरी मिली तो परिवार की ज़िम्मेदारी।
शादी हुई तो जीवनसाथी की चिंता।
बच्चे हुए तो उनकी परवरिश और भविष्य की चिंता।
और जब उम्र ढलने लगी तो शरीर ने भी अपनी परेशानियाँ दिखानी शुरू कर दीं।
यानी इंसान जब तक माँ की कोख में था, तब तक सुकून ही सुकून था; दुनिया में कदम रखते ही ज़िम्मेदारियों और परेशानियों का सिलसिला शुरू हो गया।
शायद यही ज़िंदगी है।

इमामत की जगह

इंसान को ज़िंदगी गुज़ारने के लिए कुछ न कुछ करना ही पड़ता है। वरना खाली हाथ बैठकर ज़िंदगी गुज़ारना बहुत मुश्किल हो जाता है।
वैसे तो शिक्षा एक ऐसा समंदर है जिसकी कोई सीमा नहीं। जितना सीखें, उतना ही कम लगता है। लेकिन ज़िंदगी हर किसी को अपनी परिस्थितियों के हिसाब से फैसले लेने पर मजबूर कर देती है।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
मैंने बी.एड. तक की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद मेरी शिक्षा की यात्रा को कुछ समय के लिए विराम देना पड़ा। ज़िंदगी में एक नया रिश्ता और नई ज़िम्मेदारियाँ दस्तक दे चुकी थीं। अब ज़रूरत थी रोज़गार की।

मैं नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटकता रहा। कई बार उम्मीद जगी और कई बार मायूसी हाथ लगी।
इसी उधेड़बुन के बीच मैं दिल्ली पहुँच गया।
दिल्ली मेरे लिए सिर्फ़ एक शहर नहीं थी, बल्कि मेरी ज़िंदगी का एक नया अध्याय थी।
वहाँ मुझे इल्हामी मस्जिद, प्रेम नगर-03, नांगलोई में इमामत की जगह मिल गई।
मस्जिद में नमाज़ पढ़ाने के साथ-साथ बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा भी देनी थी।
मैंने मस्जिद ज्वाइन कर ली।
शायद मुझे उस समय नहीं मालूम था कि यही जगह आगे चलकर मेरी ज़िंदगी की कुछ सबसे खूबसूरत यादों की गवाह बनने वाली है।
यहीं मुझे दो ऐसे बच्चे मिले, जिनका ज़िक्र मैंने ऊपर किया है—मोहम्मद शकील और अब्दुल क़ादिर।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस होता है कि वे सिर्फ़ मेरे स्टूडेंट नहीं थे, बल्कि मेरी ज़िंदगी के उस दौर की एक खूबसूरत याद हैं।

मस्जिद का इमाम

सन् 2001 से तक़रीबन 2006 तक मैंने वहाँ इमामत की।
लगभग पाँच वर्षों का यह सफ़र आज भी मेरी यादों में बिल्कुल ताज़ा है।
इस दौरान वहाँ के लोगों ने मुझे जो प्यार, सम्मान और अपनापन दिया, उसने मेरे दिल के कई ग़मों को हल्का कर दिया।
मैं वहाँ सिर्फ़ नमाज़ पढ़ाने वाला इमाम नहीं था। बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते उनसे एक रिश्ता बन गया था और मोहल्ले के लोगों से भी अपनापन हो गया था।
वहीं मुझे बच्चों को पढ़ाने का पहला वास्तविक अनुभव मिला।
आज मैं शिक्षक हूँ और बच्चों के बीच अपना जीवन गुज़ार रहा हूँ, लेकिन बच्चों को पढ़ाने का जो पहला अनुभव मुझे दिल्ली की उस मस्जिद में मिला था, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता।
वहाँ बिताए हुए वे वर्ष मेरी ज़िंदगी के सुनहरे पन्नों में शामिल हैं।

मोहब्बत की एक छोटी-सी मिसाल

इल्हामी मस्जिद के चारों तरफ़ हिंदू-मुस्लिम परिवार रहते थे। अलग-अलग धर्म और अलग-अलग मान्यताएँ थीं, लेकिन दिलों में इंसानियत और एक-दूसरे के लिए सम्मान था।

इस मोहब्बत की एक छोटी-सी मिसाल आज भी मुझे याद है।
मस्जिद के बिल्कुल बगल में अवधेश कुमार उर्फ़ पप्पू भाई का घर था। वे वहीं जनरल स्टोर चलाते थे।
मैं मस्जिद का इमाम था और वे एक हिंदू परिवार से ताल्लुक रखते थे।
लेकिन हमारे बीच कभी धर्म की दीवार खड़ी नहीं हुई।
लगभग हर सुबह उनके घर से मेरे लिए चाय के साथ टोश आता था।
यह कोई एक-दो दिन की बात नहीं थी।
जब तक मैं वहाँ रहा, यह सिलसिला लगातार चलता रहा।
उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि मैं कौन हूँ, किस मज़हब से हूँ या मस्जिद में क्या करता हूँ। उनके लिए मैं बस एक इंसान और पड़ोसी था।
और मेरे लिए वे सिर्फ़ पड़ोसी नहीं, बल्कि एक मोहब्बत करने वाले भाई थे।

यही तो है हमारा हिंदुस्तान

उन्होंने और उनके परिवार ने हमेशा बड़े प्यार और ख़ुलूस के साथ मेरा ख़याल रखा।
अक्सर पूछते कि खाने-पीने में कोई परेशानी तो नहीं है? किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं?
उनके इस अपनापन ने मुझे यह महसूस कराया कि इंसानियत किसी मज़हब की मोहताज नहीं होती।
हम अक्सर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि हिंदू-मुस्लिम भाईचारा होना चाहिए, लेकिन असली भाईचारा उन छोटी-छोटी घटनाओं में दिखाई देता है, जहाँ बिना किसी स्वार्थ के एक इंसान दूसरे इंसान का हाथ थाम लेता है।
भारत की असली खूबसूरती भी शायद यही है।

यहाँ मंदिर की घंटी और मस्जिद की अज़ान के बीच भी इंसानियत की आवाज़ सुनी जा सकती है।
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई—अलग-अलग धर्मों के लोग जब एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं और मिल-जुलकर त्योहार मनाते हैं, तभी हमारा समाज और हमारा देश खूबसूरत बनता है।
एक-दूसरे के दुख-दर्द में काम आना, मुसीबत के समय साथ खड़ा होना और बिना किसी भेदभाव के इंसान को इंसान समझना—यही हमारी असली पहचान है।
मुझे अपने मुल्क पर गर्व है।
मादरे वतन से हमें बेपनाह मोहब्बत है।
और जब दिल्ली के उन दिनों को याद करता हूँ, तो दिल की गहराइयों से बस यही दुआ निकलती है—

हर दिल में मोहब्बत की ख़ुशबू महके,
हर दिल से नफ़रत की दीवारें मिट जाएँ,
हर इंसान दूसरे इंसान के काम आए,
 ऐसा हिंदुस्तान बना दे या अल्लाह।

 ज़रूरी गुज़ारिश _ 

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