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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 16


 


Some Things About Yourself – Part 16

अपने बारे में कुछ बातें – भाग 16

एक शिक्षक की सस्पेंस से भरी प्रेरणादायक कहानी

लेखक: रिजवान सिद्दीकी

दिन हफ्तों में, हफ्ते महीनों में और महीने सालों में बदलते चले गए। देखते ही देखते पाँच साल का लंबा समय बीत गया।
रोज समय पर स्कूल जाना और छुट्टियों के दिनों में शेरशाह सूरी के ऐतिहासिक शहर सासाराम की सैर करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। कभी शेरशाह सूरी के मकबरे पर जाता, तो कभी उनके पिता हसन खाँ सूरी के मकबरे को देखने पहुँच जाता। कभी तारा चंडी पहाड़ी की सैर करता, तो कभी पीर चंदतन शहीद बाबा की पहाड़ी पर जाकर उनके मजार पर हाजिरी देता।
जिस जगह मेरा डेरा था, वह भी अपने आप में एक ऐतिहासिक और खूबसूरत स्थान था—सूरजपुरा।
वहाँ के लोग बेहद प्यार करने वाले थे। बाजार में सस्ता से सस्ता सामान मिल जाता था। भोजपुरी भाषा इतनी प्यारी और मीठी थी कि सुनने वाले के कानों में मानो रस घुल जाता था।
सुबह जब मैं मॉर्निंग वॉक के लिए निकलता, तो एक अलग ही नजारा देखने को मिलता। क्या हिंदू, क्या मुसलमान—सब एक-दूसरे का अभिवादन करते। खासकर मेरे हिंदू भाई मुझे पूरे आदर के साथ “अस्सलामु अलैकुम” कहते और गुरुजी के रूप में मेरा सम्मान करते।
धीरे-धीरे मैं अपने पूरे परिवार के साथ वहाँ रहने लगा था। उस जगह से मेरा ऐसा लगाव हो गया था कि मैं खुद को वहीं का निवासी समझने लगा था।

उदास मन

रोज की तरह उस दिन भी मैं समय पर उठ गया। सुबह की नमाज के बाद मॉर्निंग वॉक के लिए निकल पड़ा।
नवंबर का महीना था और साल था 2017 महीने की आधी तारीखें बीत चुकी थीं। मौसम बिल्कुल साफ था। गर्मी पूरी तरह विदा हो चुकी थी और ठंड ने दस्तक दे दी थी।
लेकिन न जाने क्यों, उस दिन मेरा मन बहुत उदास था।
दिल अंदर ही अंदर बैठा जा रहा था। ऐसा महसूस हो रहा था, मानो कोई बुरी खबर मेरा इंतजार कर रही हो। मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जिसका कारण मुझे समझ में नहीं आ रहा था।
सबसे पहले मैं राजा राधिका रमण प्रसाद जी की हवेली की ओर गया और वहाँ टहलने लगा। लेकिन मेरा मन वहाँ भी नहीं लगा। कुछ देर बाद मेरे कदम अपने आप राजेश्वरी हाई स्कूल की ओर मुड़ गए।
जब मैं स्कूल पहुँचा, तो देखा कि कुछ लोग आसन लगाकर बैठे थे, कुछ दौड़ लगा रहे थे और कुछ लोग लोम-विलोम कर रहे थे।
तभी मेरी नजर अपने प्रभारी प्रधानाध्यापक सुरेश सर पर पड़ी, जिन्हें मैंने विद्यालय का प्रभार सौंप रखा था। वे बड़े आराम से टहल रहे थे।
मैं थोड़ा तेज कदमों से उनके पास पहुँचा और उनके साथ-साथ चलने लगा।

हेड सर का इशारा

सुरेश सर ने मेरी ओर देखते हुए पूछा, “क्या बात है, रिजवान साहब? आज आप बहुत उदास दिखाई दे रहे हैं।”
मैंने कहा, “पता नहीं सर! आज मुझे खुद भी कुछ समझ में नहीं आ रहा है। दिल बहुत बेचैन है। किसी काम में मन नहीं लग रहा।”
इसी तरह कुछ देर तक हमारी बातचीत होती रही। इसके बाद मैं अपने कमरे पर लौट आया।
घर पहुँचकर मैंने स्नान किया और फिर रोज की तरह अपना राशिफल देखने लगा।
राशिफल में लिखा था कि नवंबर का महीना फलदायी रहेगा और बेकार की बेचैनी दूर हो जाएगी। नए काम शुरू करने में सावधानी बरतने की जरूरत होगी। पुराने समय का कोई बिगड़ा हुआ रिश्ता सुधर सकता है और कोई बड़ा काम बिना अधिक प्रयास के पूरा हो सकता है। साथ ही, माता-पिता की सेहत चिंता का कारण बन सकती है।
राशिफल पढ़कर मुझे हैरानी हुई, क्योंकि उसमें लिखी बेचैनी वाली बात मेरी उस दिन की मनःस्थिति से मेल खा रही थी।
लेकिन क्या सचमुच कोई अनहोनी होने वाली थी? या यह केवल मेरे मन का वहम था?
इन्हीं विचारों में उलझा मैं समय का ध्यान ही नहीं रख पाया। जब विद्यालय पहुँचा, तब तक सभी शिक्षक आ चुके थे और छात्र अपनी-अपनी कक्षाओं में बैठ चुके थे।
लेकिन आज विद्यालय का माहौल कुछ अलग ही था।
चारों ओर एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ था।
जैसे ही मैंने कार्यालय में प्रवेश किया, सभी शिक्षकों की निगाहें मेरी ओर मुड़ गईं। कार्यालय में भी पूरी खामोशी छाई हुई थी।
सभी शिक्षक बस मेरी ओर देख रहे थे। वे शिक्षक, जो मुझसे बेहद प्यार करते थे और मेरा बहुत सम्मान करते थे, आज बिल्कुल चुप थे।
उनकी खामोशी देखकर मेरी बेचैनी और बढ़ गई। ऐसा लग रहा था, मानो कोई बड़ा हादसा हो चुका हो।
मेरा दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि मुझे लगा, जैसे वह सीने से बाहर निकल आएगा। घबराहट दूर करने के लिए मैंने मन ही मन दुआएँ पढ़नी शुरू कर दीं।
तभी हेड सर ने सामने रखी एक कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बहुत धीमी आवाज में कहा, “बैठ जाइए।”
मैं उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।

शिक्षकों की खामोशी

मैंने अपनी उपस्थिति दर्ज की, लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा। सभी शिक्षक अब भी खामोश बैठे थे।
आखिरकार, मुझसे रहा नहीं गया। मैंने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा, “आप लोग आज इस तरह खामोश क्यों हैं? आखिर बात क्या है?”
मेरे सवाल का किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी प्रधानाध्यापक महोदय ने अपने बैग से एक पत्र निकाला और मेरी ओर बढ़ा दिया।
पत्र देखते ही मेरे दिल की धड़कन और तेज हो गई। मैं अंदर से बुरी तरह सहम गया। मेरे पूरे शरीर में कंपकंपी होने लगी।
मैंने काँपते हाथों से पत्र पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह मेरे हाथों से फिसलकर नीचे गिर पड़ा।
कार्यालय में अब भी वही खामोशी थी।
तभी एक शिक्षक अपनी कुर्सी से उठे, नीचे गिरा हुआ पत्र उठाया और मेरे हाथों में थमा दिया।
शिक्षकों की चुप्पी मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। मेरे मन में तरह-तरह के सवाल उठ रहे थे।
आखिर उस पत्र में ऐसा क्या लिखा था, जिसे देखकर सभी शिक्षक खामोश थे?
क्या मेरी नौकरी से जुड़ी कोई परेशानी थी? क्या कोई ऐसा आदेश आया था, जो मेरी जिंदगी बदल देने वाला था?
मैंने धड़कते दिल, काँपते हाथों और थरथराते होंठों के साथ पत्र पर अपनी नजरें दौड़ाईं।
पत्र पढ़ते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मैं बिल्कुल सन्न रह गया!
आखिर उस पत्र में ऐसा क्या लिखा था?
मेरे साथ क्या होने वाला था?
यह जानने के लिए पढ़िए अगली किस्त…

क्रमशः…

लेखक: रिजवान सिद्दीकी

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