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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 17


                    

 
    
Some Things About Yourself – Part 17

अपने बारे में कुछ बातें – भाग 17

एक शिक्षक की सस्पेंस से भरी प्रेरणादायक कहानी

एक शिक्षक अपनी कुर्सी से उठे और पत्र मेरे हाथों में थमा दिया। कमरे में बैठे सभी शिक्षक खामोश थे। उनकी यह खामोशी मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मैंने धड़कते दिल, थरथराते हाथों और काँपते होंठों के साथ पत्र पर अपनी नज़रें दौड़ाईं।
पत्र पढ़ते ही मैं बिल्कुल सन्न रह गया। अभी मेरी नज़र पत्र की हेडलाइन पर ही पड़ी थी कि तभी मेरे एक शिक्षक साथी ने वह पत्र मेरे हाथों से ले लिया।
अब तो मेरी घबराहट और भी बढ़ गई थी। मैं मन ही मन सोच रहा था, या अल्लाह! आखिर यह सब क्या हो रहा है?
उधर पत्र शिक्षकों के हाथों में घूम रहा था और इधर मेरे दिमाग में नवंबर महीने का वह राशिफल घूम रहा था, जिसे मैं कुछ देर पहले ही पढ़कर आया था।
इसी बीच पत्र गोल मेज़ का चक्कर लगाते हुए फिर से प्रधानाध्यापक महोदय के हाथों में पहुँच चुका था। राशिफल की आखिरी पंक्ति ने मेरे दिल को थोड़ी राहत दी थी। उसमें लिखा था—
“नवंबर का महीना कुल मिलाकर आपके लिए अच्छा ही रहेगा।”

घबराहट से सुकून तक

अब मैं मन ही मन आने वाली हर मुसीबत का सामना करने के लिए खुद को तैयार कर रहा था। तभी कमरे की खामोशी को तोड़ती हुई प्रधानाध्यापक महोदय की आवाज़ मेरे कानों से टकराई—
“रिजवान सर! अगर आप सुनने के लिए तैयार हैं, तो मैं कुछ कहूँ?”
मैंने अपनी घबराहट को दिल में दबाते हुए जवाब दिया—
“यस सर, बिल्कुल!”
प्रधानाध्यापक महोदय ने बिना किसी भूमिका के कहा—
“तो आप जान लीजिए कि यह पत्र आपके स्थानांतरण का आदेश है। आपका यहाँ से ट्रांसफर हो चुका है। जाइए, दरभंगा जाने की तैयारी कीजिए!”
स्थानांतरण का नाम सुनते ही मेरी आँखों के सामने राशिफल की वह पंक्ति घूमने लगी, जिसमें लिखा था—
“माह के अंत में लंबी यात्रा की स्थिति बन सकती है। कोई बड़ा काम बिना प्रयास के पूरा होगा।”

गै़बी मदद

अब मेरे दिल को पूरी तरह सुकून मिल चुका था। मेरी घबराहट और परेशानियाँ जैसे पल भर में खत्म हो गई थीं।
जिस पत्र को देखकर मैं किसी अनहोनी की आशंका से परेशान हो उठा था, उसी पत्र ने मेरे चेहरे पर मुस्कान ला दी थी। मैं तो किसी बुरी खबर के डर से घबराया हुआ था, लेकिन अल्लाह ने मेरी मदद की और मुझे राहत के साथ इज़्ज़त भी बख्शी।
दरअसल, स्थानांतरण का मामला मेरे लिए बिल्कुल नया नहीं था। कुछ महीने पहले मैंने स्वयं ही विभाग को स्थानांतरण के लिए आवेदन दिया था। इसकी सबसे बड़ी वजह मेरी माँ की बीमारी थी। उनकी तबीयत अक्सर खराब रहने लगी थी। माँ की बीमारी मुझे अंदर ही अंदर परेशान किए रहती थी। मैं चाहता था कि उनके पास रहकर उनकी देखभाल कर सकूँ और मुश्किल की इस घड़ी में उनका सहारा बन सकूँ।
आखिर माँ से बढ़कर इस दुनिया में और कौन हो सकता है, जिसके लिए इंसान अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हो जाए?
माँ की मोहब्बत, उनकी दुआएँ और उनकी कुर्बानियाँ ऐसी दौलत हैं, जिनकी कीमत दुनिया की कोई भी चीज़ नहीं चुका सकती।
इसीलिए तो कहा गया है—

माँ के कदमों में जन्नत होती है,
माँ की दुआ में अजीब बरकत होती है।

माँ के लिए निकला हुआ हर आँसू, उनकी सेवा में उठाया गया हर कदम और उनके चेहरे पर लाई गई हर मुस्कान इंसान के जीवन को खुशियों से भर सकती है।
मेरे लिए दरभंगा स्थानांतरण का यह आदेश केवल एक सरकारी पत्र नहीं था, बल्कि अपनी बीमार माँ के पास रहने की उम्मीद भी था।

अल्लाह का शुक्र है कि मेरी परेशानी का हल निकल आया था।

बाकी कहानी अगली कड़ी में पढ़ें…

लेखक: रिजवान सिद्दीकी





Email. hmrizwanamani@gamil.com

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