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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 12

 


Some Things About Yourself – Part 12

अपने बारे में कुछ बातें – भाग 12

शेर शाह सूरी के मकबरे की सैर

मेरे प्यारे दोस्तों!

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि मैं एक शिक्षक हूँ। मुझे छठी कक्षा में हिंदी विषय पढ़ाने का अवसर मिला। एक दिन बच्चों ने बताया, “सर, आज पाठ संख्या 18 पढ़ाना है।”

जब मैंने पाठ संख्या 18 खोला, तो उसमें शेर शाह सूरी की कहानी थी। यह देखकर मेरे दिल में एक अजीब-सी हलचल पैदा हो गई। मैंने बड़े उत्साह के साथ बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इस बात से मैं रोमांचित था कि जिस क्षेत्र में शेर शाह सूरी का शासन रहा था, उसी इलाके में खड़े होकर मैं अपने विद्यार्थियों को उनके बारे में पढ़ा रहा था।

शेर शाह सूरी का मकबरा

दोस्तों! अब जब मैं अपने परिवार के साथ शेर शाह सूरी के मकबरे पर पहुँचा, तो हमें वहाँ किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, जो हमें मकबरे के बारे में विस्तार से बताए। मकबरे को देखते ही मुझे अपने विद्यार्थियों को पढ़ाई गई एक-एक बात याद आने लगी। फिर क्या था! मैंने अपने परिवार के बच्चों को बताना शुरू किया—

“बच्चो! यह शेर शाह सूरी का ऐतिहासिक मकबरा है। उनका असली नाम फ़रीद ख़ान था। उन्होंने वर्ष 1540 में मुग़ल बादशाह हुमायूँ को हराकर उत्तर भारत में सूरी साम्राज्य की स्थापना की थी।”

शेर शाह सूरी ने अपने जीवनकाल में ही अपने मकबरे का निर्माण शुरू करवा दिया था। उन्हें एक कुशल प्रशासक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने अपने शासनकाल में प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने, न्याय व्यवस्था में सुधार लाने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कई कदम उठाए। कहा जाता है कि युवावस्था में एक शेर को मारने की घटना के बाद वे शेर ख़ान के नाम से प्रसिद्ध हुए और आगे चलकर शेर शाह सूरी कहलाए।

मकबरे की अद्भुत खूबसूरती

शेर शाह सूरी के मकबरे की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भव्यता और सुंदर वास्तुकला है। यह मकबरा बिहार के सासाराम शहर में स्थित है। एक विशाल जलाशय के बीच ऊँचे चबूतरे पर बना यह मकबरा दूर से ही अपनी सुंदरता से लोगों को आकर्षित करता है।

इसका विशाल गुंबद और चारों ओर फैला जलाशय इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा देते हैं। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह मकबरा भारतीय-इस्लामी वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी बनावट में अफ़ग़ान स्थापत्य कला की झलक भी दिखाई देती है।

मकबरे का निर्माण शेर शाह सूरी के शासनकाल में लगभग 1540 से 1545 ईस्वी के बीच हुआ। इसके वास्तुकार के रूप में मीर मुहम्मद अलीवाल ख़ान का नाम लिया जाता है। पानी के बीच स्थित होने के कारण यह ऐतिहासिक इमारत देखने वालों के मन पर गहरी छाप छोड़ती है। इसकी भव्यता के कारण इसे भारत के प्रसिद्ध ऐतिहासिक मकबरों में गिना जाता है।

दरबान का मकबरा और बादशाह से मिलने की कल्पना

शेर शाह सूरी के मुख्य मकबरे के पास एक अन्य ऐतिहासिक मकबरा भी है, जिसे परंपरागत रूप से उनके दरबान के मकबरे के नाम से जाना जाता है।

इसे देखकर मेरे मन में एक दिलचस्प ख्याल आया। मैंने सोचा कि मानो कोई व्यक्ति पहले दरबान के पास पहुँचकर बादशाह से मिलने की इजाज़त माँगता होगा और फिर बादशाह के सामने हाज़िर होता होगा।

इतिहास की इमारतें केवल पत्थरों से बनी संरचनाएँ नहीं होतीं, बल्कि वे हमें बीते हुए समय की याद दिलाती हैं और हमारी कल्पनाओं को भी नई उड़ान देती हैं।

एक साधारण परिवार से भारत के बादशाह तक का सफर

दोस्तों! अब आइए, शेर शाह सूरी के जीवन की एक झलक पर भी नज़र डालते हैं।

शेर शाह सूरी का जन्म 15वीं शताब्दी के अंतिम दौर में एक अफ़ग़ान परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम फ़रीद ख़ान था। वे हसन ख़ान सूर के पुत्र थे। अपनी योग्यता, साहस, राजनीतिक समझ और सैन्य कौशल के बल पर उन्होंने धीरे-धीरे अपनी शक्ति बढ़ाई और अंततः उत्तर भारत के एक शक्तिशाली शासक बने।

वर्ष 1540 में हुमायूँ को पराजित करने के बाद उन्होंने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार कर लिया और सूरी साम्राज्य की स्थापना की। उनका शासनकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन प्रशासन, सड़क निर्माण, डाक व्यवस्था और मुद्रा सुधार जैसे क्षेत्रों में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।

उनकी जीवनगाथा हमें यह सिखाती है कि साहस, दूरदर्शिता और कुशल नेतृत्व किसी व्यक्ति को इतिहास में एक विशेष स्थान दिला सकते हैं।

परिवार के साथ यादगार पल

दोस्तों! हमने अपने परिवार के साथ शेर शाह सूरी के मकबरे पर फ़ातिहा पढ़ी, वहाँ की ऐतिहासिक इमारतों को देखा और खूब सैर-सपाटा किया। बच्चों ने भी इस सैर का भरपूर आनंद लिया।

मेरे लिए यह यात्रा और भी खास थी, क्योंकि जिस ऐतिहासिक व्यक्तित्व के बारे में मैंने अपने विद्यार्थियों को कक्षा में पढ़ाया था, आज उसी की यादगार इमारत को मैं अपने परिवार के साथ अपनी आँखों से देख रहा था।

एक शिक्षक के लिए इससे बढ़कर खुशी की बात और क्या हो सकती है कि किताबों में पढ़ा हुआ इतिहास वास्तविक जीवन में देखने का अवसर मिले और वह अपने परिवार के साथ उस अनुभव को साझा कर सके!

दोस्तों, हमारी इस ऐतिहासिक सैर की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। आगे की दिलचस्प बातें जानने के लिए अगली किस्त का इंतज़ार कीजिए।

बाक़ी अगली किस्त में…

लेखक: एच. एम. रिज़वान सिद्दीक़ी

ईमेल: hmrizwanamani@gmail.com

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