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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 13


सासाराम में लॉटरी के माध्यम से स्कूल आवंटन और बिक्रमगंज प्रखंड मिलने की कहानी


Some Things About Yourself – Part 13

अपने बारे में कुछ बातें – भाग 13

शेरशाह सूरी की नगरी सासाराम में नौकरी पाकर मैं बहुत खुश था। और वह भी एक स्कूल में, जहाँ मुझे बच्चों को पढ़ाने का अवसर मिला था। यह मेरी ज़िंदगी की सबसे पसंदीदा ख्वाहिश थी। बचपन से ही मेरी इच्छा थी कि मैं भी एक शिक्षक बनूँ और छोटे-छोटे बच्चों को पूरी मेहनत और लगन से पढ़ाऊँ।

दरअसल, मेरे माता-पिता दोनों शिक्षक थे। मेरे नाना और मेरे दो मामू भी शिक्षक थे। मेरे दो चाचा भी शिक्षक थे। इस तरह मैं बचपन से ही शिक्षकों के बीच पला-बढ़ा था। जब मेरी शादी हुई, तो इत्तेफ़ाक़ से मेरी पत्नी के पिता भी शिक्षक निकले। मेरी वाइफ के तीन भाइयों में दो इंजिनियर और एक शिक्षक थे 

शायद यही वजह थी कि मेरे दिल में भी शिक्षक बनने की ललक हमेशा बनी रही। आख़िरकार, खुदा ने मेरी दुआएँ क़बूल कर लीं और मुझे शिक्षक बनने का मौक़ा मिल गया।

कहते हैं कि खुदा के हर काम में इंसान की बेहतरी छिपी होती है, लेकिन इंसान अक्सर उस बेहतरी को समझ नहीं पाता।

खुदा के हर काम में मसलेहत होती है

अगर इंसान की हर ख्वाहिश पूरी हो जाती और उसके हर इरादे कामयाब हो जाते, तो शायद वह खुदा की हिकमत और उसके वजूद को समझने की कोशिश ही न करता। यही वजह है कि इंसान की हर इच्छा पूरी नहीं होती। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

सासाराम में बड़ी पारदर्शिता के साथ स्कूलों का आवंटन किया जा रहा था। एक हांडी में स्कूलों के नाम लिखी हुई पर्चियाँ डाल दी गई थीं। सभी शिक्षकों को बारी-बारी से बुलाया जाता और हांडी में हाथ डालकर एक पर्ची निकालने को कहा जाता। जिसके हाथ में जिस स्कूल की पर्ची आती, उसे उसी स्कूल में जाकर अपनी सेवा देनी होती थी। यह सब अपनी-अपनी किस्मत का खेल था।

जब हांडी में हाथ डालने के लिए मेरा नाम पुकारा गया, तो अचानक ऐसा लगा मानो मेरे बदन के रोंगटे खड़े हो गए हों। उस समय मुझे एक अजीब-सा एहसास हुआ, जिसे शब्दों में बयां करना मेरे लिए मुश्किल है।

मैं दिल ही दिल में खुदा को याद करते हुए, थरथराते हाथों से हांडी में हाथ डालकर एक पर्ची निकाली। जब मैंने पर्ची खोलकर देखा, तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मैं मानो खुशी से उछल पड़ा, क्योंकि उस पर्ची में बिक्रमगंज प्रखंड का नाम लिखा हुआ था।

दरअसल, जब मैं लॉटरी में शामिल होने के लिए सासाराम जा रहा था, तो रास्ते में बिक्रमगंज से गुज़रा था। उस समय इस प्रखंड को देखकर मेरे दिल में एक ख्वाहिश पैदा हुई थी। मैंने दिल ही दिल में खुदा से दुआ की थी, “मौला! मुझे इसी प्रखंड में नियुक्ति देना।”

और आज ऐसा लग रहा था मानो खुदा ने मेरी उस दुआ को भी क़ुबूल कर लिया हो। मेरी पर्ची में बिक्रमगंज प्रखंड का नाम निकला था। उस पल मेरी खुशी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था।

सचमुच, जब इंसान सच्चे दिल से कोई दुआ माँगता है और उसकी मुराद पूरी हो जाती है, तो दिल शुक्र और खुशी से भर जाता है। उस दिन मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

वाक़ई, खुदा के हर काम में कोई न कोई मसलेहत होती है, लेकिन इंसान उसे तुरंत समझ नहीं पाता। कई बार जिस बात को हम अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ समझते हैं, वही आगे चलकर हमारे लिए बेहतर साबित होती है।

मैं उस स्कूल में पाँच साल रहा। इस दौरान मैंने वहाँ के शिक्षकों और गाँव के लोगों के साथ बहुत ही हँसी-खुशी से समय बिताया और पूरी ईमानदारी, मेहनत तथा लगन के साथ अपनी सेवाएँ दीं।

आज जब मैं उन दिनों को याद करता हूँ, तो दिल में सुकून और ख़ुशी का एहसास होता है। सचमुच, ज़िंदगी में कई बार खुदा के फ़ैसले हमारी अपनी पसंद से अलग होते हैं, लेकिन वक़्त बीतने के साथ हमें उनकी अहमियत समझ में आने लगती है।

बाकी पार्ट न 14 में पढ़ें। 

hmrizwanamani@gmail.com









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