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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 9


पार्ट 9

सूरजपुरा का वीरान महल और राजा राधिका रमन प्रसाद सिन्हा की यादें

कभी-कभी हम मॉर्निंग वॉक के लिए अपने रूम से उत्तर दिशा की ओर निकल जाते थे। लगभग सौ कदम की दूरी तय करते ही हमें वह महल नज़र आने लगता, जो कभी सूरजपुरा की आन-बान और शान हुआ करता था।
वह महल था राजा राधिका रमन प्रसाद सिन्हा जी का बंगला।
लेकिन समय ने करवट ली और आज वही महल वीरान पड़ा था। ऐसा लगता था मानो वह अपनी बर्बादी पर आँसू बहा रहा हो। एक-एक करके उसकी दीवारें जर्जर हो चुकी थीं और कभी शान से खड़ी रहने वाली इमारत अब अपने पुराने दिनों की कहानी खुद बयां कर रही थी।
महल का दरबार-ए-आम, जहाँ कभी राजा साहब का दरबार लगता था, वह भी अब वीरानी और जर्जरता का शिकार था।
जब कभी महल के अंदर झाँकने की कोशिश करता तो ऐसा महसूस होता, मानो उन खामोश दीवारों के बीच से आज भी कोई धीमी-सी सरगोशी सुनाई दे रही हो।
ऐसा लगता जैसे बीता हुआ ज़माना हमें पुकार रहा हो—
“देखो... कभी यहाँ कितनी रौनक हुआ करती थी!”
राजा राधिका रमन प्रसाद सिन्हा
राजा राधिका रमन प्रसाद सिन्हा (1890–1971) सूरजपुरा राज के शासक होने के साथ-साथ हिंदी साहित्य के एक प्रख्यात लेखक और पद्म भूषण से सम्मानित व्यक्तित्व थे।
उनका जन्म 10 सितंबर 1890 को बिहार के तत्कालीन शाहाबाद जिले में एक शाही परिवार में हुआ था। वे राजा राजराजेश्वरी प्रसाद सिन्हा के सबसे बड़े पुत्र थे।
हिंदी कथा साहित्य में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘द गांधी कैप एंड अदर शॉर्ट स्टोरीज़’, ‘पुरुष और नारी’ तथा ‘पूर्व और पश्चिम’ जैसी रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।
जब वे मात्र 12 वर्ष के थे, वर्ष 1903 में उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनकी संपत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के नियंत्रण में चली गई।
उनका संबंध साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र से भी गहरा रहा। कथा साहित्य के अलावा उन्होंने नाटक और संस्मरण भी लिखे।
सन् 1927 से 1935 के बीच उन्होंने अपने प्रशासनिक और सामाजिक कार्यों के माध्यम से कई महत्वपूर्ण सुधार किए। महात्मा गांधी के प्रभाव में उन्होंने बोर्ड की चेयरमैनशिप छोड़ दी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आग्रह पर बिहार हरिजन सेवक संघ से भी जुड़े।
उनका जीवन केवल राजसी ठाठ-बाट तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज, साहित्य और शिक्षा के प्रति भी उनका गहरा लगाव था।

शाही तालाब

महल के उत्तर दिशा में एक शाही तालाब भी है।
कभी इस तालाब का पानी साफ और उपयोग के योग्य हुआ करता था। राजा साहब के परिवार के लोग और बच्चे इसी तालाब में स्नान किया करते होंगे। लेकिन आज वही तालाब अपनी बदहाली की कहानी कह रहा है।
तालाब के चारों ओर अब जंगल ही जंगल दिखाई देता है। पानी भी पहले जैसा साफ नहीं रहा और वीरानी ऐसी कि लोग अब उस तरफ जाना भी पसंद नहीं करते।
कभी-कभी जब हम उधर से गुजरते तो मेरे मन में एक अजीब-सा ख्याल आता।
ऐसा लगता मानो राजा साहब की रूह इसी महल और तालाब के आसपास कहीं घूम रही हो और अपनी उजड़ती हुई विरासत को देख रही हो।
शायद वे हमें देख रहे हों...
शायद अपने महल की हालत देखकर अफसोस कर रहे हों...
और शायद उनके दिल से आवाज़ निकल रही हो—

“काश! मैं आज ज़िंदा होता...
तो मेरा यह महल इस तरह वीरान न होता।
जिस तालाब में मेरे बच्चे नहाया करते थे,
आज वह जंगलों से न घिरा होता।
काश... काश... ऐ काश!”

लेकिन वक्त किसी के लिए नहीं रुकता।
जो महल कभी शान हुआ करता था, आज खामोशी की चादर ओढ़े खड़ा है।
और हम, जो वहाँ से रोज़ गुजरते हैं, उसकी खामोश दीवारों में छिपी हुई बीते हुए जमाने की कहानी को महसूस करने की कोशिश करते हैं।

बाकी अगली कड़ी में पढ़ें...

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