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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 10


सूर्यपुरा की मोहब्बत: जहाँ हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल देखने को मिली

बिहार राज्य के रोहतास ज़िले को ‘चावल का कटोरा’ भी कहा जाता है। रोहतास के 19 प्रखंडों में सूर्यपुरा भी एक प्रखंड है। सूर्यपुरा की सबसे ख़ास बात यह है कि यहाँ हिन्दू और मुस्लिम भाई बड़े प्यार-मोहब्बत, एकता और भाईचारे के साथ रहते हैं।
मैं सूर्यपुरा में पाँच साल रहा। इस दौरान वहाँ की जो बात मुझे सबसे ज़्यादा अच्छी लगी, वह थी हिन्दू-मुस्लिम एकता, आपसी प्रेम और इत्तेहाद। वहाँ लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते हैं और त्योहारों को भी मिल-जुलकर मनाते हैं।

ईद की पार्टी

ईद के दिन रात के बारह-बारह बजे तक सेवइयों की दावत चलती थी। हमारे हिन्दू भाई बड़े प्यार से हमारे घर आते और ईद की खुशियों में शामिल होते थे। इसी तरह होली के अवसर पर भी वे बड़े प्यार से हमें अपने घर बुलाते, जहाँ खूब हँसी-मज़ाक और दावतों का दौर चलता था।
रमज़ान के महीने में भी हमारे हिन्दू भाई अपने-अपने घरों में रोज़ा इफ़्तार का इंतज़ाम करते थे। बाहर से आने वाले लोगों को भी वहाँ बहुत इज़्ज़त और अपनापन मिलता था।
मुझे सूर्यपुरा पहुँचते ही ऐसा महसूस हुआ, जैसे मैं अपनी कोई खोई हुई जगह दोबारा पा गया हूँ। वहाँ मुझे किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। फ़ौरन ही रहने के लिए मकान मिल गया और खाने-पीने का इंतज़ाम भी जल्द ही हो गया।

होली की पार्टी और इंसानियत की मिसाल

जब मैंने स्कूल ज्वाइन किया था, तब मुझे पहला वेतन सात महीने बाद मिला। इस दौरान मैं जिस हिन्दू भाई के होटल में खाना खाता था और जिस मकान में रहता था, उन्होंने मुझसे कभी पैसे नहीं माँगे।
जब मेरा वेतन मिला, तो मैंने स्वयं जाकर उनके पैसे चुका दिए। उनके इस व्यवहार को मैं आज भी याद करता हूँ। किसी बाहर से आए व्यक्ति के साथ इतना अपनापन और भरोसा दिखाना कोई मामूली बात नहीं है।
यह सब राजा साहब की मोहब्बत और उनके अच्छे प्रभाव का नतीजा था कि सूर्यपुरा में आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं, जो आपसी प्रेम और भाईचारे को ज़िन्दगी का अहम हिस्सा मानते हैं।

बुरी नज़र न लगे इस मोहब्बत को!

सूर्यपुरा में मेरे बहुत-से हिन्दू और मुस्लिम भाई हैं, जिन्हें मैं ज़िन्दगी भर याद करता रहूँगा। अगर मैं उनमें से एक-दो लोगों के नाम लेता हूँ, तो शायद दूसरों के साथ नाइंसाफ़ी होगी। इसलिए मैं सूर्यपुरा के तमाम निवासियों का दिल की गहराइयों से शुक्रिया अदा करता हूँ और उन सबको हज़ारों सलाम पेश करता हूँ।
मैं सूर्यपुरा की हवाओं, फ़िज़ाओं, गलियों और दर-ओ-दीवार को भी सलाम करता हूँ, जहाँ मेरे ज़िन्दगी के पाँच साल बड़े प्यार और मोहब्बत के साथ गुज़रे। वह जगह, जहाँ की खुली हवाओं में मैंने सुकून की साँसें लीं और जहाँ के लोगों ने मुझे कभी पराया महसूस नहीं होने दिया।
आज भी जब सूर्यपुरा की याद आती है, तो वहाँ के लोगों का प्यार, त्योहारों की रौनक और आपसी भाईचारा आँखों के सामने घूमने लगता है।

ख़ुदा से मेरी दिली दुआ है कि सूर्यपुरा में हिन्दू-मुस्लिम एकता और मोहब्बत हमेशा क़ायम रहे। इस भाईचारे को किसी की बुरी नज़र न लगे और आने वाली पीढ़ियाँ भी इसी प्यार, इत्तेहाद और इंसानियत की परम्परा को आगे बढ़ाती रहें। आमीन!

आगे की कहानी पार्ट न० 11 में पढ़ें। 
hmrizwanamani@gmail.com







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