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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 8


पार्ट 8
सूरजपुरा में नई ज़िंदगी और मॉर्निंग वॉक की दोस्ती

मेरे प्यारे दोस्त!

अब मैं पूरी तरह से सूरजपुरा में शिफ्ट हो चुका था। मेरा दो बेडरूम वाला छोटा-सा फ्लैट बिल्कुल बाजार के बीचों-बीच था।

अपने कमरे से जैसे ही पूरब की ओर निकलता, सीधे मुख्य बाजार में प्रवेश हो जाता। बाजार में हर तरह का सामान आसानी से मिल जाता था। उस पर मज़े की बात यह थी कि आसपास के दूसरे इलाकों की तुलना में इस बाजार में सामान काफी सस्ते रेट पर मिल जाता था।

मतलब, जो सामान चाहिए, ले लो।

थोड़ा और आगे बढ़ो तो तरह-तरह की हरी सब्ज़ियों से बाजार भरा पड़ा था। ऐसी ताज़ी सब्ज़ियाँ कि देखते ही मुँह में पानी आ जाए। कुछ कदम और आगे बढ़ो तो मछली, मटन और चिकन की भी कोई कमी नहीं थी।

कुल मिलाकर, रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए मुझे जो कुछ चाहिए था, वह सब मेरे आसपास ही मौजूद था।

मॉर्निंग वॉक

अब अगर हम अपने कमरे से पश्चिम की ओर निकलें तो कुछ ही दूरी पर एक भव्य इमारत नज़र आती थी। यह इमारत राज राजेश्वरी हाई स्कूल की थी। स्कूल के साथ एक बहुत बड़ा मैदान भी था और उसी से सटा हुआ एक स्टेडियम भी था।

लोग अक्सर सुबह मॉर्निंग वॉक करने इसी स्टेडियम में आया करते थे।

मैं भी अक्सर उसी स्टेडियम में मॉर्निंग वॉक करने जाता था। धीरे-धीरे वहाँ बहुत सारे शिक्षक भी इकट्ठा होने लगे। फिर मॉर्निंग वॉक के साथ-साथ खूब बातें भी होतीं।

कभी किसी विषय पर चर्चा होती, कभी विद्यालय की बातें होतीं और कभी शिक्षकों से जुड़ी कोई बात निकल आती। मैं भी उन लोगों की बातचीत में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करता था।

मैं अक्सर अपने एक वरिष्ठ शिक्षक साथी श्री सुरेश प्रसाद जी के साथ मॉर्निंग वॉक के लिए निकलता था। फिर धीरे-धीरे और भी बहुत सारे लोग हमारे साथ जुड़ जाते।

इस तरह देखते ही देखते वहाँ एक बहुत ही खुशनुमा माहौल बन जाता।

मॉर्निंग वॉक से वापस आने के बाद हम स्नान करते और नाश्ता करने के बाद मैं और सुरेश सर साथ ही विद्यालय के लिए निकलते। यही हमारा रोज़ का मामूल बन गया था।

सुरेश सर बाइक नहीं चलाते थे, इसलिए वे मेरे साथ ही विद्यालय जाते थे। मेरा विद्यालय मेरे कमरे से लगभग 5–6 किलोमीटर की दूरी पर था, इसलिए मैं बड़े आराम से विद्यालय पहुँच जाता था।

मेरी एक छोटी-सी आदत

धीरे-धीरे मेरी एक आदत-सी बन गई थी।

जब भी मैं अकेला बाइक से कहीं जाता और रास्ते में कोई बुज़ुर्ग या अधेड़ उम्र का आदमी पैदल जाता हुआ दिखाई देता, तो मैं उसे अपनी बाइक पर बैठा लेता।

हाँ, बाइक पर किसी को बैठाने में मैं एक सावधानी ज़रूर बरतता था—मैं आम तौर पर बुज़ुर्ग या अधेड़ उम्र के लोगों को ही लिफ्ट देता था।

जब वह व्यक्ति अपनी मंज़िल पर उतरता तो अक्सर मुझे दिल से दुआ देता।

उनकी वह दुआ सुनकर मुझे बहुत खुशी होती और दिल को एक अजीब-सा सुकून मिलता।

शायद किसी की मदद करने की सबसे बड़ी खुशी यही होती है कि बदले में आपको कुछ नहीं चाहिए होता, लेकिन सामने वाले की दिल से निकली हुई दुआ आपके दिल को खुश कर देती है।

मेरे इस छोटे-से काम का एक और फायदा हुआ। धीरे-धीरे उस इलाके के बहुत सारे लोग मुझे पहचानने लगे। लोग मुझे जानने लगे और मेरी इस आदत की तारीफ़ भी करने लगे।

इस तरह देखते ही देखते मेरी ज़िंदगी सूरजपुरा में अच्छी तरह जमने लगी थी।

वक़्त बहुत अच्छे से बीतने लगा था।

लेकिन ज़िंदगी में आगे क्या होने वाला था, यह मुझे उस समय बिल्कुल मालूम नहीं था...

बाकी अगले पार्ट में पढ़ें।

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Rest tomorrow

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