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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 7

पार्ट नंबर 7

किराये का मकान और सूर्यपुरा का चुनाव

दरभंगा से सासाराम, फिर रोहतास जिले तक का मेरा सफर और उसके बाद स्कूल ज्वाइन करने तक का पूरा मामला कुल मिलाकर बहुत अच्छे ढंग से गुजर गया। रास्ते में आई सांप वाली घटना को छोड़ दें, तो बाकी सारे काम बड़ी आसानी से होते चले गए। कोई ऐसा गंभीर मामला सामने नहीं आया, जिसने मेरे सफर में कोई बड़ी रुकावट पैदा की हो।

लेकिन अब मेरे सामने एक नई चिंता थी—रहने के लिए किराये का मकान कहाँ मिले?

मेरी नियुक्ति मध्य विद्यालय कुसुम्हारा में हुई थी। कुसुम्हारा एक छोटा-सा गांव था। यह कोई बहुत बड़ा या विकसित गांव नहीं था। गांव में लोग अपनी जरूरत के हिसाब से ही मकान बनाते हैं। इसलिए वहां किराये पर कमरा या पूरा मकान मिलना आसान नहीं था।

अब मेरे सामने दो विकल्प थे।

कुसुम्हारा से पश्चिम की ओर नटवार था। वहां एक छोटा-सा बाजार था और रोजमर्रा की जरूरत की कई चीजें आसानी से मिल जाती थीं। दो-तीन बैंकों की शाखाएं भी थीं।

दूसरी तरफ, पूरब में सूर्यपुरा था। यह भी एक गांव था, लेकिन अपने आप में काफी विकसित और महत्वपूर्ण जगह थी। आसपास के कई पंचायतों के लोगों का आना-जाना वहां रहता था। अच्छा-खासा बाजार था, बैंक थे और जरूरत की लगभग सभी चीजें उपलब्ध थीं।

लेकिन सूर्यपुरा की सबसे खास बात मेरे लिए कुछ और थी।

यह वही गांव था, जिसका संबंध महान साहित्यकार और विद्वान राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह जी से था। आगे चलकर मुझे यह महसूस हुआ कि इस गांव में रहना मेरे लिए केवल सुविधा का फैसला नहीं था, बल्कि यह मेरे जीवन की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाला था।

सूर्यपुरा में हिन्दू-मुस्लिम सहित अलग-अलग धर्मों और जातियों के लोग मिल-जुलकर रहते थे। गांव का माहौल भी मुझे अच्छा लगा।

अब सवाल था—नटवार या सूर्यपुरा?

काफी सोच-विचार के बाद मैंने सूर्यपुरा को चुन लिया।

इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि मेरा स्कूल बिक्रमगंज प्रखंड में था और सूर्यपुरा से बिक्रमगंज की दूरी नटवार की तुलना में मेरे लिए अधिक सुविधाजनक थी। इसलिए मैंने मन ही मन तय कर लिया—

अब रहना है तो सूर्यपुरा में ही।

और शायद ऊपर वाले ने भी मेरे लिए रास्ता पहले से आसान कर रखा था।

मकान की तलाश ज्यादा लंबी नहीं चली और मुझे सूर्यपुरा में किराये का मकान मिल गया।

इस मकान को ढूंढने में मास्टर मंसूर साहब ने मेरी बहुत मदद की। एक अनजानी जगह पर उन्होंने जिस तरह मेरा साथ दिया, उसे मैं आज भी दिल से याद करता हूं।

मैं उनका तहे-दिल से शुक्रगुजार हूं।

किसी नए आदमी के लिए किसी अनजान जगह पर पहुंचकर रहने की जगह तलाशना आसान नहीं होता। लेकिन जब कोई व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के आपका हाथ पकड़कर आपकी मदद करता है, तो वह मदद सिर्फ उस समय की परेशानी दूर नहीं करती, बल्कि दिल में हमेशा के लिए अपनी जगह बना लेती है।

इस मौके पर मुझे किसी शायर का यह खूबसूरत शेर याद आता है—

करो मेहरबानी तू अहले-ज़मीं पर,
खुदा मेहरबान होगा अर्श-ए-बरीं पर।

यानी अगर इंसान जमीन पर किसी दूसरे इंसान की मदद करता है, तो उसकी वह मदद कभी बेकार नहीं जाती। जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर, किसी न किसी रूप में, उसका बदला ऊपर वाला जरूर देता है।

अंग्रेजी में भी एक बात कही जाती है—

“You help me, God helps you.”

मेरा मानना है कि इंसान को जहां भी मौका मिले, दूसरे इंसान की मदद जरूर करनी चाहिए। क्योंकि हम नहीं जानते कि जिंदगी के किस मोड़ पर हमें भी किसी सहारे की जरूरत पड़ जाए।

और शायद यही जिंदगी का एक खूबसूरत नियम है—

आज आप किसी का सहारा बनते हैं,
कल कोई आपका सहारा बन सकता है।

समय बीतता गया और आगे चलकर मुझे अच्छी तरह एहसास हुआ कि सूर्यपुरा में रहने का मेरा फैसला बिल्कुल सही था।

क्योंकि सूर्यपुरा सिर्फ एक गांव नहीं था। यह अपने अंदर इतिहास, साहित्य और संस्कृति की एक पूरी कहानी समेटे हुए था।

यह वही ऐतिहासिक गांव था, जिसका नाम महान साहित्यकार और ऐसे राजा राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह जी से जुड़ा था, जिन्होंने महात्मा गांधी के विचारों और उनके रास्ते से प्रभावित होकर समाज और देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उस समय मुझे शायद अंदाजा भी नहीं था कि जिस गांव को मैंने केवल रहने की सुविधा के लिए चुना है, आने वाले दिनों में वही गांव मेरी जिंदगी की कहानी का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनने वाला है।

और दोस्तों,
आज की कहानी हम यहीं समाप्त करते हैं।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

अगले पार्ट में हम जानेंगे—

राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह जी कौन थे?

उनका जीवन कैसा था?
साहित्य के क्षेत्र में उनका क्या योगदान था?
और सूर्यपुरा से उनका इतना गहरा रिश्ता क्यों था?

इन सब बातों को जानने के लिए पढ़िए कहानी का अगला अध्याय—

 ज़रूरी गुज़ारिश _ 

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पार्ट नंबर 8 — राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह जी की कहानी

जारी है...

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