कुछ अपने बारे में — पार्ट नं. 3
एक नई जगह, एक नई रात और एक जानलेवा हादसा
दोस्तों, आज 2 फ़रवरी 2012 है। मध्य विद्यालय कुसुम्हारा, बिक्रमगंज, ज़िला रोहतास में मेरा योगदान हो चुका है। विद्यालय की छुट्टी के बाद आज मैं उसी विद्यालय के एक शिक्षक मो. मंसूर आलम साहब के घर मेहमान हूँ। उनका घर विद्यालय के बिल्कुल नज़दीक था।
घर अभी नया-नया बनकर तैयार हुआ था, हालांकि प्लास्टर का कुछ काम बाकी था। मेरे लिए यह जगह बिल्कुल नई थी—नया विद्यालय, नए सहकर्मी और नए लोग।
उनके घर के पास ही एक मस्जिद थी। रात का खाना ईशा की नमाज़ के बाद ही खाया जाता था। मंसूर साहब ने बड़े सम्मान और आत्मीयता के साथ मुझे खाने की मेज़ पर बैठाया। उन्होंने मेरे लिए एक खास व्यंजन तैयार किया था—भोजपुर का मशहूर खाना, लिट्टी-चोखा।
घर अभी नया-नया बनकर तैयार हुआ था, हालांकि प्लास्टर का कुछ काम बाकी था। मेरे लिए यह जगह बिल्कुल नई थी—नया विद्यालय, नए सहकर्मी और नए लोग।
उनके घर के पास ही एक मस्जिद थी। रात का खाना ईशा की नमाज़ के बाद ही खाया जाता था। मंसूर साहब ने बड़े सम्मान और आत्मीयता के साथ मुझे खाने की मेज़ पर बैठाया। उन्होंने मेरे लिए एक खास व्यंजन तैयार किया था—भोजपुर का मशहूर खाना, लिट्टी-चोखा।
शायद मैं पहली बार लिट्टी-चोखा चख रहा था। ऊपर से देशी घी मिला हुआ हो तो उसके स्वाद का क्या कहना! मैं बहुत दिनों से लिट्टी-चोखे का नाम सुनता आ रहा था, लेकिन कभी खाने तो दूर, चखने का भी मौका नहीं मिला था। आज वह स्वादिष्ट व्यंजन बिना किसी परेशानी के मेरे सामने था।
बिहार के खान-पान की बात हो और लिट्टी-चोखे का ज़िक्र न हो, ऐसा भला कैसे हो सकता है! खासकर जाड़े के मौसम में गरमागरम लिट्टी, चोखा और ऊपर से देशी घी—इसका आनंद ही कुछ और होता है।
खाना खाने के बाद हम काफी देर तक इधर-उधर की बातें करते रहे। फिर सोने का समय हो गया।
बिहार के खान-पान की बात हो और लिट्टी-चोखे का ज़िक्र न हो, ऐसा भला कैसे हो सकता है! खासकर जाड़े के मौसम में गरमागरम लिट्टी, चोखा और ऊपर से देशी घी—इसका आनंद ही कुछ और होता है।
खाना खाने के बाद हम काफी देर तक इधर-उधर की बातें करते रहे। फिर सोने का समय हो गया।
जानलेवा हादसा
रोहतास ज़िले के कुसुम्हारा गाँव में यह मेरी पहली रात थी। मेरे लिए सब कुछ नया था। नई जगह, नए लोग और नई जिम्मेदारियाँ। फिर भी मुझे किसी तरह की परेशानी या घबराहट महसूस नहीं हो रही थी।
मंसूर साहब के घर में चार बेडरूम के अलावा एक अलग मेहमान कमरा भी था। उन्होंने अपना बिस्तर भी मेरे साथ उसी कमरे में लगाया।
मैं अपने बिस्तर पर लेटा आने वाले कल के बारे में सोच रहा था। मन ही मन दिनभर के कामों की रूपरेखा बना रहा था—कल विद्यालय में कौन-कौन से काम करने हैं, किन लोगों से मिलना है और नई जगह पर अपनी जिम्मेदारियों को किस तरह निभाना है।
इन्हीं विचारों के बीच न जाने कब नींद ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरी आँख लग गई।
मंसूर साहब भी गहरी नींद में सो चुके थे।
रात का सन्नाटा था। मैं आधी नींद और आधी बेहोशी की हालत में बिस्तर पर पड़ा हुआ था कि अचानक मोबाइल की तेज़ घंटी बज उठी।
घंटी की आवाज़ इतनी अचानक और तेज़ थी कि हम दोनों की आँखें खुल गईं। एक पल के लिए मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
पहले मेरी आँख खुली। फिर मैंने धीरे-धीरे अपने आसपास देखने की कोशिश की। कुछ क्षणों के लिए मेरा दिमाग जैसे काम करना बंद कर चुका था।
मैंने अपने हाथ-पैर हिलाए और खुद से पूछा—
“मैं कहाँ हूँ?”
धीरे-धीरे मेरी याददाश्त वापस आने लगी। मुझे सब कुछ याद आ गया—मैं अपने घर पर नहीं, बल्कि सासाराम-बिक्रमगंज के कुसुम्हारा गाँव में था, जहाँ मैं विद्यालय में योगदान देने आया था।
तभी मेरे मन में सवाल उठा—
“इतनी रात गए किसका फोन आ सकता है?”
यह सोचते हुए मैंने बिस्तर से उठने के लिए जैसे ही अपना हाथ आगे बढ़ाया...
अचानक मेरा हाथ किसी ठंडी, लंबी और जीवित चीज़ से टकराया।
मैंने हाथ हटाने की कोशिश की। लेकिन अगले ही पल मेरी नज़र उस चीज़ पर पड़ी और मेरे होश उड़ गए।
मेरे हाथ के नीचे एक बड़ा-सा लंबा साँप था!
मेरे मुँह से अचानक एक ज़ोरदार चीख निकल गई—
“आऽऽऽऽऽह!”
उस एक चीख ने रात की खामोशी को चीर दिया...
मंसूर साहब के घर में चार बेडरूम के अलावा एक अलग मेहमान कमरा भी था। उन्होंने अपना बिस्तर भी मेरे साथ उसी कमरे में लगाया।
मैं अपने बिस्तर पर लेटा आने वाले कल के बारे में सोच रहा था। मन ही मन दिनभर के कामों की रूपरेखा बना रहा था—कल विद्यालय में कौन-कौन से काम करने हैं, किन लोगों से मिलना है और नई जगह पर अपनी जिम्मेदारियों को किस तरह निभाना है।
इन्हीं विचारों के बीच न जाने कब नींद ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरी आँख लग गई।
मंसूर साहब भी गहरी नींद में सो चुके थे।
रात का सन्नाटा था। मैं आधी नींद और आधी बेहोशी की हालत में बिस्तर पर पड़ा हुआ था कि अचानक मोबाइल की तेज़ घंटी बज उठी।
घंटी की आवाज़ इतनी अचानक और तेज़ थी कि हम दोनों की आँखें खुल गईं। एक पल के लिए मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
पहले मेरी आँख खुली। फिर मैंने धीरे-धीरे अपने आसपास देखने की कोशिश की। कुछ क्षणों के लिए मेरा दिमाग जैसे काम करना बंद कर चुका था।
मैंने अपने हाथ-पैर हिलाए और खुद से पूछा—
“मैं कहाँ हूँ?”
धीरे-धीरे मेरी याददाश्त वापस आने लगी। मुझे सब कुछ याद आ गया—मैं अपने घर पर नहीं, बल्कि सासाराम-बिक्रमगंज के कुसुम्हारा गाँव में था, जहाँ मैं विद्यालय में योगदान देने आया था।
तभी मेरे मन में सवाल उठा—
“इतनी रात गए किसका फोन आ सकता है?”
यह सोचते हुए मैंने बिस्तर से उठने के लिए जैसे ही अपना हाथ आगे बढ़ाया...
अचानक मेरा हाथ किसी ठंडी, लंबी और जीवित चीज़ से टकराया।
मैंने हाथ हटाने की कोशिश की। लेकिन अगले ही पल मेरी नज़र उस चीज़ पर पड़ी और मेरे होश उड़ गए।
मेरे हाथ के नीचे एक बड़ा-सा लंबा साँप था!
मेरे मुँह से अचानक एक ज़ोरदार चीख निकल गई—
“आऽऽऽऽऽह!”
उस एक चीख ने रात की खामोशी को चीर दिया...
आखिर वह साँप वहाँ कैसे पहुँचा था?
क्या वह मेरे बिस्तर पर ही था?
और उस रात मेरे साथ क्या हुआ?
ज़रूरी गुज़ारिश _
अगला भाग पढ़ने के लिए हमारे facebook अकॉउंट को Follow कर के हमें अपनी हिम्मत और हौसला दें 'और हमारे क़लम को और मज़बूत करें।
आप का एक follow हमारे लिए बहुत ही बड़ी प्रेरणा है।
यह जानने के लिए पढ़िए—
“कुछ अपने बारे में” पार्ट नं. 4

1 Comments
Very good information.
ReplyDeleteMay Allah bless you as soon as pocibless
Hello guys, let me know how the post is. And do share it among your friends. Thank you,
हेलो दोस्त , पोस्ट कैसी लगी ज़रूर बताएं, और अपने दोस्तों में ज़रूर शेयर करदें. धन्यवाद I