कुछ अपने बारे में — पार्ट नं. 4
अँधा साँप
अचानक मोबाइल की आवाज़ से मेरी आँख खुली। मैं अभी पूरी तरह नींद से जाग भी नहीं पाया था। बिस्तर से उठने का इरादा ही कर रहा था कि अचानक मेरा हाथ किसी नर्म और ठंडी वस्तु पर पड़ा।
मैंने जैसे ही हाथ हटाया, मेरी नज़र उस चीज़ पर गई और मेरे होश उड़ गए।
अरे! यह तो साँप है!
मैं घबराकर फ़ौरन बिस्तर से उछल पड़ा। मेरी घबराहट देखकर मंसूर साहब भी परेशान होकर उठ बैठे।
“क्या हुआ? क्या हुआ?”
जैसे ही उन्हें मेरे मुँह से “साँप” शब्द सुनाई दिया, वे भी एक पल के लिए भौचक्के रह गए।
मैंने उन्हें समझाते हुए कहा—
“अरे, काटा नहीं है... आप परेशान न हों।”
मंसूर साहब ने तुरंत टॉर्च उठाई और उसकी रोशनी में साँप को देखने लगे। साँप बिस्तर पर ही गोल होकर बैठा हुआ था। उसे देखकर मंसूर साहब ने कहा—
“यह अँधा साँप है। इसे दिखाई नहीं देता।”
फिर वे टॉर्च की रोशनी में इधर-उधर साँप को ध्यान से देखने लगे।
मेरे लिए यह अँधा साँप देखने का पहला अनुभव था। इससे पहले इस तरह के साँप से मेरा कभी वास्ता नहीं पड़ा था।
बाद में पता चला कि वह साँप छत के दो पत्थरों के बीच की जगह से फिसलकर सीधे मेरे बिस्तर पर आ गिरा था। सोचकर ही मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे कि अगर उस समय मेरा हाथ उसके ऊपर पड़ने के बजाय उसके मुँह के पास चला जाता तो क्या होता!
मैंने जैसे ही हाथ हटाया, मेरी नज़र उस चीज़ पर गई और मेरे होश उड़ गए।
अरे! यह तो साँप है!
मैं घबराकर फ़ौरन बिस्तर से उछल पड़ा। मेरी घबराहट देखकर मंसूर साहब भी परेशान होकर उठ बैठे।
“क्या हुआ? क्या हुआ?”
जैसे ही उन्हें मेरे मुँह से “साँप” शब्द सुनाई दिया, वे भी एक पल के लिए भौचक्के रह गए।
मैंने उन्हें समझाते हुए कहा—
“अरे, काटा नहीं है... आप परेशान न हों।”
मंसूर साहब ने तुरंत टॉर्च उठाई और उसकी रोशनी में साँप को देखने लगे। साँप बिस्तर पर ही गोल होकर बैठा हुआ था। उसे देखकर मंसूर साहब ने कहा—
“यह अँधा साँप है। इसे दिखाई नहीं देता।”
फिर वे टॉर्च की रोशनी में इधर-उधर साँप को ध्यान से देखने लगे।
मेरे लिए यह अँधा साँप देखने का पहला अनुभव था। इससे पहले इस तरह के साँप से मेरा कभी वास्ता नहीं पड़ा था।
बाद में पता चला कि वह साँप छत के दो पत्थरों के बीच की जगह से फिसलकर सीधे मेरे बिस्तर पर आ गिरा था। सोचकर ही मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे कि अगर उस समय मेरा हाथ उसके ऊपर पड़ने के बजाय उसके मुँह के पास चला जाता तो क्या होता!
साँप का जोड़ा
मंसूर साहब का कहना था कि अगर एक साँप यहाँ मिला है तो इसका जोड़ा भी आसपास ज़रूर होगा।
उनकी बात सच निकली।
थोड़ी तलाश के बाद दूसरा साँप भी मिल गया। वह छत के दो पत्थरों के बीच बैठा हुआ था, जैसे अपने साथी के अचानक नीचे गिर जाने का इंतज़ार कर रहा हो।
सावधानी से डंडों की मदद से उसे भी नीचे गिराया गया और फिर दोनों साँपों को घर से बाहर निकाल दिया गया।
अब भला नींद कहाँ आने वाली थी!
नई जगह पर मेरी पहली ही रात इस तरह की घटना हो जाए, तो उसके बाद किसी के लिए भी चैन से सो पाना आसान नहीं था। मैं बार-बार उसी घटना के बारे में सोच रहा था।
कुछ देर बाद मैंने अपना मोबाइल उठाकर देखा।
अरे! यह तो मेरे अब्बू का फोन था!
तभी मेरे मन में एक अजीब-सा एहसास हुआ।
अगर उस समय अब्बू का फोन नहीं आया होता और मोबाइल की घंटी से मेरी आँख नहीं खुली होती, तो शायद मैं उसी साँप के ऊपर हाथ रखकर उठता।
मैंने तुरंत अब्बू को फोन किया और पूरी घटना उन्हें बताई। मैंने उनसे कहा—
“अब्बू! रात बारह बजे आपका फोन आया और आपकी उसी एक कॉल ने शायद मुझे साँप से बचा लिया।”
यह कहते-कहते मेरे दिल में अपने अब्बू के लिए एक अलग ही एहसास पैदा हो गया।
उसी समय मुझे अपनी लिखी हुई एक ग़ज़ल याद आ गई, जो मैंने बाप की अहमियत पर लिखी थी।
उनकी बात सच निकली।
थोड़ी तलाश के बाद दूसरा साँप भी मिल गया। वह छत के दो पत्थरों के बीच बैठा हुआ था, जैसे अपने साथी के अचानक नीचे गिर जाने का इंतज़ार कर रहा हो।
सावधानी से डंडों की मदद से उसे भी नीचे गिराया गया और फिर दोनों साँपों को घर से बाहर निकाल दिया गया।
अब भला नींद कहाँ आने वाली थी!
नई जगह पर मेरी पहली ही रात इस तरह की घटना हो जाए, तो उसके बाद किसी के लिए भी चैन से सो पाना आसान नहीं था। मैं बार-बार उसी घटना के बारे में सोच रहा था।
कुछ देर बाद मैंने अपना मोबाइल उठाकर देखा।
अरे! यह तो मेरे अब्बू का फोन था!
तभी मेरे मन में एक अजीब-सा एहसास हुआ।
अगर उस समय अब्बू का फोन नहीं आया होता और मोबाइल की घंटी से मेरी आँख नहीं खुली होती, तो शायद मैं उसी साँप के ऊपर हाथ रखकर उठता।
मैंने तुरंत अब्बू को फोन किया और पूरी घटना उन्हें बताई। मैंने उनसे कहा—
“अब्बू! रात बारह बजे आपका फोन आया और आपकी उसी एक कॉल ने शायद मुझे साँप से बचा लिया।”
यह कहते-कहते मेरे दिल में अपने अब्बू के लिए एक अलग ही एहसास पैदा हो गया।
उसी समय मुझे अपनी लिखी हुई एक ग़ज़ल याद आ गई, जो मैंने बाप की अहमियत पर लिखी थी।
बाप की अहमियत
कौन है वह जो रहमत की तरह होता है,
बाप का साया है जो छत की तरह होता है।
खुद जले धूप में, बच्चों को बचाता है वही,
ऐसा वह साया है जो राहत की तरह होता है।
अपने अरमान को सीने में दबाने वाला,
है वही बाप जो नेमत की तरह होता है।
खुद परेशान है, बच्चों को खुशी देता है,
वो तो बेटे के लिए हिम्मत की तरह होता है।
जिसके सर पर है अभी बाप का साया, यारो,
बाप घर भर के लिए नेमत की तरह होता है।उसकी खिदमत में कभी देर न करना रिज़वां,
बाप फिर मिलता नहीं, किस्मत की तरह होता है।
ग़ज़ल की ये पंक्तियाँ उस रात मेरे दिल पर जैसे और भी गहरी उतर गई थीं।
अब कहाँ नींद आने वाली थी!
मैं रात भर करवटें बदलता रहा। आँखें बंद करता तो वही साँप मेरी आँखों के सामने आ जाता। एक पल के लिए भी ठीक से नींद नहीं आई।
सुबह की अज़ान से कुछ पहले ही मैं मस्जिद पहुँच गया।
नमाज़ के बाद भी मेरे दिल और दिमाग में बार-बार एक ही सवाल घूम रहा था—
“अगर वह साँप मुझे काट लेता तो क्या होता?”
और फिर दूसरा सवाल—
“अगर उस वक्त मेरे अब्बू का फोन नहीं आया होता तो क्या होता?”
इन सवालों ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था।
उस रात मुझे पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि कभी-कभी ज़िंदगी में होने वाली छोटी-सी घटना भी कितनी बड़ी मुसीबत को टाल सकती है।
इसीलिए तो कहा जाता है—
“किस्मत खराब हो तो ऊँट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है, और किस्मत अच्छी हो तो इंसान पर आने वाली बड़ी से बड़ी मुसीबत भी टल जाती है।”
उस रात मुझे ऐसा लगा जैसे ऊपर वाले ने मेरे अब्बू के फोन को ही मेरी हिफ़ाज़त का ज़रिया बना दिया हो।
आज भी जब उस रात को याद करता हूँ तो दिल में एक ही बात आती है—
माता-पिता की दुआ और उनकी मोहब्बत इंसान के लिए कितनी बड़ी नेमत होती है, इसका एहसास कभी-कभी किसी घटना के बाद ही होता है।
आगे की कहानी पार्ट नं. 5 में पढ़ें...
अब कहाँ नींद आने वाली थी!
मैं रात भर करवटें बदलता रहा। आँखें बंद करता तो वही साँप मेरी आँखों के सामने आ जाता। एक पल के लिए भी ठीक से नींद नहीं आई।
सुबह की अज़ान से कुछ पहले ही मैं मस्जिद पहुँच गया।
नमाज़ के बाद भी मेरे दिल और दिमाग में बार-बार एक ही सवाल घूम रहा था—
“अगर वह साँप मुझे काट लेता तो क्या होता?”
और फिर दूसरा सवाल—
“अगर उस वक्त मेरे अब्बू का फोन नहीं आया होता तो क्या होता?”
इन सवालों ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था।
उस रात मुझे पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि कभी-कभी ज़िंदगी में होने वाली छोटी-सी घटना भी कितनी बड़ी मुसीबत को टाल सकती है।
इसीलिए तो कहा जाता है—
“किस्मत खराब हो तो ऊँट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है, और किस्मत अच्छी हो तो इंसान पर आने वाली बड़ी से बड़ी मुसीबत भी टल जाती है।”
उस रात मुझे ऐसा लगा जैसे ऊपर वाले ने मेरे अब्बू के फोन को ही मेरी हिफ़ाज़त का ज़रिया बना दिया हो।
आज भी जब उस रात को याद करता हूँ तो दिल में एक ही बात आती है—
माता-पिता की दुआ और उनकी मोहब्बत इंसान के लिए कितनी बड़ी नेमत होती है, इसका एहसास कभी-कभी किसी घटना के बाद ही होता है।
आगे की कहानी पार्ट नं. 5 में पढ़ें...
The rest of tomorrow
hmrizwanamani@gmail.com


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Hello guys, let me know how the post is. And do share it among your friends. Thank you,
हेलो दोस्त , पोस्ट कैसी लगी ज़रूर बताएं, और अपने दोस्तों में ज़रूर शेयर करदें. धन्यवाद I