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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 5

 


कुछ अपने बारे में पाँचवाँ भाग — विद्यालय में पहला दिन, साँप की घटना, कुसुमहारा गाँव, बच्चों की प्रार्थना और नए शिक्षक के रूप में रिज़वान सर का पहला अनुभव।

कुछ अपने बारे में — विद्यालय में पहला दिन

बार-बार मेरे दिल में यही ख़याल आ रहा था कि अगर वह साँप मुझे काट लेता तो क्या होता? और अगर उसी समय मेरे अब्बू का फ़ोन नहीं आया होता, तो न जाने क्या हो जाता!

मेरा जो होता, सो होता ही; लेकिन मंसूर सर, जिनका मैं मेहमान था, उनकी भी कितनी बदनामी होती। उन्हें न जाने कितने लोगों को जवाब देना पड़ता और वे सफ़ाई देते-देते परेशान हो जाते। मगर मेरे ख़ुदा ने मुझ पर भी और मंसूर सर पर भी अपना करम किया और हम दोनों को एक बड़ी मुसीबत से बचा लिया।

इसी एहसास के साथ मैं मस्जिद पहुँचा और फ़ौरन बारगाह-ए-इलाही में सज्दारेज़ हो गया। दिल से शुक्र अदा किया और अपने रब का शुक्रिया कहा कि उसने मुझे एक बड़े हादसे से महफ़ूज़ रखा।

फ़ज्र की नमाज़ के बाद मन कुछ हल्का और शरीर बिल्कुल तरोताज़ा महसूस हो रहा था। मैं रात की उस ख़ौफ़नाक घटना को भूलने की कोशिश कर रहा था। धीरे-धीरे सुबह की रौनक बढ़ने लगी।

कुछ देर बाद कुसुमहारा गाँव के कई लोगों से मुलाक़ात हुई। उन्हें जब रात की घटना के बारे में पता चला तो वे बेहद अफ़सोस करने लगे। जब उन्हें मालूम हुआ कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद किसी तरह की कोई क्षति नहीं हुई, तो उनके आश्चर्य की भी कोई सीमा नहीं थी। हर कोई यही कह रहा था कि यह ऊपर वाले की बड़ी मेहरबानी थी।

बातों-बातों में पता ही नहीं चला कि नाश्ते का वक़्त हो गया। नाश्ता करने के बाद अब विद्यालय जाने का समय था। विद्यालय गाँव के बिल्कुल क़रीब ही था। मंसूर सर के साथ मैं भी विद्यालय की ओर चल पड़ा।

विद्यालय का पहला दृश्य

यह एक मिडिल स्कूल था। प्रधानाध्यापक सहित लगभग चौदह शिक्षक पहले से ही विद्यालय में कार्यरत थे। विद्यालय में कई कक्षा-कक्ष थे और एक अलग कार्यालय-कक्ष भी था। सभी कमरे बड़े सलीके और करीने से व्यवस्थित थे। बच्चों के खेलने के लिए विद्यालय के चारों ओर एक बड़ी-सी चहारदीवारी भी थी।

विद्यालय का वातावरण मुझे पहली ही नज़र में अच्छा लगा। शिक्षक बड़े ख़ुशमिज़ाज, मिलनसार और अच्छे अख़लाक़ वाले थे। उनके चेहरे पर अपनापन था, जिससे मुझे बिल्कुल ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मैं किसी अनजान जगह पर आया हूँ।

तभी प्रार्थना का समय हो गया।

बच्चे मैदान में कतारबद्ध होकर खड़े हो गए और सामूहिक स्वर में प्रार्थना शुरू हुई—

तू ही राम है, तू रहीम है,
तू करीम, कृष्ण, ख़ुदा हुआ।
तू ही वाहे गुरु, तू ईश मसीह,
हर नाम में तू समा रहा।

तेरी ज़ात-ए-पाक़ क़ुरआन में,
तेरा दर्शन वेद-पुराण में,
गुरु ग्रंथ जी के बखान में,
तू प्रकाश अपना दिखा रहा।

बच्चों की आवाज़ में स्थानीय भोजपुरी लहजे की मिठास घुली हुई थी। जब इतने सारे बच्चे एक साथ उस प्रार्थना को गा रहे थे तो ऐसा लग रहा था, मानो आवाज़ सीधे दिल में उतर रही हो। सच कहूँ तो उस क्षण मेरा रोम-रोम जाग उठा।

प्रार्थना समाप्त हुई और धीरे-धीरे सभी शिक्षक भी विद्यालय पहुँच गए। एक-एक करके मेरा परिचय सभी शिक्षकों से कराया गया। इसके बाद प्रधानाध्यापक महोदय मुझे अपने साथ लेकर अलग-अलग कक्षाओं में गए और बच्चों से मेरा परिचय कराया।

बच्चे एक नए शिक्षक को देखकर आपस में धीमी आवाज़ में सरगोशियाँ कर रहे थे। उनकी आँखों में उत्सुकता थी। वे बार-बार मेरी ओर देखते और फिर अपने साथियों से कुछ कहने लगते।


छात्रों से पहला परिचय

सबसे पहले हम छठी कक्षा में पहुँचे।

प्रधानाध्यापक महोदय ने बच्चों की ओर इशारा करते हुए मुस्कुराकर कहा—

“देखिए बच्चों, यह हमारे लिए बड़ी खुशी की बात है कि आज हमारे विद्यालय में एक नए शिक्षक आए हैं। ये आपके छठे वर्ग के क्लास टीचर होंगे। इनका नाम है रिज़वान सर और ये बिहार के दरभंगा ज़िले से आए हैं।”

बच्चे बड़ी उत्सुकता से मेरी ओर देखने लगे।

हेड सर ने बच्चों से बातचीत को थोड़ा दिलचस्प बनाने के लिए कहा—

“आप लोग दरभंगा का लंगड़ा आम तो जानते ही होंगे, जिसे मालदा आम भी कहा जाता है। वह कितना मशहूर है! और मुज़फ्फरपुर की लीची को कौन नहीं जानता? बिहार में दही-चूड़ा भी बड़े मज़े से खाया जाता है।”

बच्चे उनकी बातें बड़े गौर से सुन रहे थे। कभी उनकी ओर देखते तो कभी मेरी ओर। शायद उनके मन में भी यह जिज्ञासा थी कि दरभंगा से आया यह नया शिक्षक आख़िर कैसा है?

प्रधानाध्यापक महोदय ने हँसते हुए मेरी ओर देखा और फिर बच्चों से कहा—

“अब ये आपके अपने रिज़वान सर हैं। इनसे खूब पढ़िए, सवाल पूछिए और मन लगाकर पढ़ाई कीजिए।”

मैं बच्चों के सामने खड़ा था। सामने न जाने कितने मासूम चेहरे थे और उन चेहरों पर एक साथ उत्सुकता, अपनापन और अनगिनत सवाल दिखाई दे रहे थे।

उस पल मुझे एहसास हुआ कि मैं केवल एक नए विद्यालय में नहीं आया हूँ, बल्कि मेरी ज़िंदगी का एक नया अध्याय शुरू हो चुका है।

रात का वह डरावना साँप, मस्जिद में किया गया शुक्राना, गाँव के लोगों की बातें और अब इन मासूम बच्चों के बीच खड़ा मैं—सब कुछ जैसे एक ही कहानी के अलग-अलग हिस्से थे।

मैंने मन ही मन अपने रब का शुक्र अदा किया और सोचा—

“शायद यही वह जगह है, जहाँ से मेरी ज़िंदगी की एक नई कहानी शुरू होने वाली है।”

 ज़रूरी गुज़ारिश _ 

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आगे की कहानी पार्ट नं. 6 में पढ़ें...

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