कब रोज़ा रखना मना है.
सफर में रोज़ा न रक्खे.
सफर से मुराद,शरई सफर है. यानि इतनी दूर जाने के इरादे से निकले की यहाँ से वहां तक तीन दिन का रास्ता हो , अगरचे वह सफर किसी भी काम के लिए हो. तो उसे अख्तयार है की वह रोज़ा न रक्खे।
मसला।>
रोज़ा रख कर सफर शुरू किया, भुला हुआ सामान लेने घर वापस आया और अब रोज़ा तोड़ दिया तो
रोज़े का कफ़्फ़ारा वाजिब है.
मसला >
सफर में रोज़ा रखने में किसी भी किस्म की परिशानी न हो, और जो उसके साथ है उसे भी कोई
दिक्कत न हो तो सफर में भी रोज़ा रखने की इजाजत है.
हमल,
हमल से मुराद प्रिग्नेंसी है, ऐसी हालत में भी रोज़ा न रखने की इजाज़त है. क्योंकि जो बच्चा माँ के पेट में फल फूल रहा है माँ के रोज़ा रखने की वजह से बच्चे को कोई तकलीफ हो, या बच्चा कमज़ोर हो जाये, या फिर माँ के कमजोर हो जाने का डर हो, या फिर बीमारी के बढ़ जाने का डर हो, इस लिए प्रिग्नेंसी की हालत में रोज़ा छोड़ने की इजाज़त है.
बच्चे को दूध पिलाना।
जो मायें अपने बच्चे को दूध पिलाती है या पिला रही हैं. उसे भी इजाज़त है की वह रोज़ा न रखे, कारण यही है की रोज़ा रखने की सूरत में हो सकता है दूध खुश्क हो जाये. सूख जाये, बच्चे को तकलीफ, जान जाने का खतरा भी लाहक़ हो सकता है, इसी लिए ऐसी माँ को भी इजाज़त है वह रोज़ा न रखे, लेकिन जब दूध पिलाने से फ़ारिग़ हो जाये तो रोज़े की कज़ा रख ले।
मरीज़।
मतलब बीमारी, मरीज़ को बीमारी के बढ़ जाने बहुत ज्यादा यक़ीन हो. या फिर देर में अच्छा होने का गुमान हो. या तंदरुस्त को बीमार हो जाने का यक़ीन हो, या बहुत ज्यादा कमज़ोर हो,तो इजाज़त है की उस दिन का रोज़ा न रखे। .
ऐसा डाक्टर जो फासिक फाज़िर न हो ईमानदार और नमाज़ी हो तो उसके मना करने पर कि रोज़ा रखने से मर्ज़ बढ़ सकता है. तो उस दिन का रोज़ा तोड़ने की इजाजत है.
बुढ़ापा और हिलाक होने का डर ,
बहुत ज्यादा बूढा और ज़ईफ़ कमज़ोर इंसान को भी रोज़े न रखने की इज़ाज़त है. की वह इतना बूढा है की रोज़ा रखने से मज़ीद कमज़ोर हो सकता है बीमारी बढ़ सकती है. बदन में पानी की कमी हो सकती जान जाने का खतरा भी बढ़ सकता है तो ऐसे बूढ़े ज़ईफ़ को भी रोज़ा न रखने की इजाज़त है.
ऐसा बूढा कि वह गर्मी में गर्मियों की वजह से रोज़ा नहीं रख सकता लेकिन वह जाड़े में रख सकता है तो वह गर्मी में रोज़ा न रखे जब जाड़ा आये तो रोज़े को पूरा करे.
रोज़े का कफ़्फ़ारा,
ऐसा बूढा आदमी की वह रोज़ा रख ही नहीं सकता, और न ही अब उम्मीद है की वह ताकतवर होगा तो वह रोज़ा न रखे बल्कि उसका कफ़्फ़ारा अदा करे, और कफ़्फ़ारा यह है की हर रोज़े के बदले एक मिस्कीन को दोनों वक़्त पेट भर खाना खिलाये. या हर रोज़े के बदले सदक़ा फ़ित्र के बराबर फ़क़ीर मिस्कीन को दे दे.
सांप काटना
सांप ने काट लिया और जान जाने का डर हो तो रोज़ा तोड़ दे और जान बचाये.
मसला >
किसी के बदले कोई दूसरा न रोज़ा रख सकता है और न ही नमाज़ पढ़ सकता है. अलबत्ता अपने नमाज़ रोज़े का सवाब दुसरे को पहुंचा सकता है.
नफ्ली रोज़ा >
नफ्ली रोज़ा वह है जिसे रखने से सवाब और न रखने पर किसी तरह का गुनाह नहीं है. अब अगर आपने कोई नफिल रोज़ा रखा है और बीच में किसी कारण तोडना पड़ा तो अब उस की क़ज़ा वाजिब है
घर आये मेहमान के लिये रोज़ा तोडना >
आपने नफिल रोज़ा रखा है और घर में कोई मेहमान आ गया तो आप नफ्ली रोज़े को तोड़ सकते है जबकि आप को पूरा यक़ीन हो की बाद में रख लेंगे.
अपने शौहर के लिए रोज़ा तोडना >
शौहर के कहने पर नफ्ली रोज़े को तोड़ सकते है. लेकिन बाद में उसकी क़ज़ा वाजिब है.
प्रश्न, मेरा हाथ टूट गया है और मैं रमजान के दौरान रोजा रखना चाहूंगी लेकिन मेरे पति मुझे रोज नहलाते हैं क्या रोजा रखना जायज है?
उत्तर >रोज़ा रखने में कोई हर्ज नहीं है आप चाहें तो रोज़ा रख सकते है.
वल्लाहो आलमो बिस्सवाब
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