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AQEEQA KYA HAI ? अक़ीक़ा क्या है.?

 


प्रस्तावना,

गूगल हब के प्रश्नों पर आधारित,,,,,,,,,,,,,,,

हमारे घरों में जब बच्चे की पैदाइश होती है,बच्चा जन्म लेता है तो इस्लाम धर्म में के अनुसार सब से पहले कौन कौन से काम किये जाते है या क्या करना चाहिए यह लेख इसी पर आधारित है इसे पढ़ें और अपनी जानकारी बढ़ायें, और अपने नेक मश्विरे से नवाज़ें.   शुक्रिया,


अज़ान देना

मज़हबे इस्लाम के मुताबिक़ बच्चे की पैदाइश(जन्म)के बाद सब से पहले उसके कानों में अज़ान दी जाती है, डॉक्टर्स का काम ख़त्म होने के बाद उसके दाहिने कान में अज़ान और बायें कान में तकबीर कही जाती है. अज़ान वही है जो नमाज़ से पहले मस्जिदों में होती है. मक़सद यही होता है की जिस ख़ालिको मालिक ने तुम्हे दुनियां में भेजा है वही अल्लाह सब से बड़ा है उसके बताये हुए उसूल और उसके बनाये हुए क़ानून के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी गुज़ारना.

अच्छा नाम रखना,

बच्चों का खूबसुरता सा नाम रखना भी पैरेंट्स की ज़िम्मेदारियाँ होती हैं.खुदा जब कोई औलाद दे तो उसका अच्छा नाम रखना चाहिये,क्यों की नाम का असर भी धीरे धीरे बच्चे में होता चला जाता है. पैग़म्बराने इस्लाम,औलिये किराम,सहाबा और सहबियत और बड़े बड़े विद्वानों के नाम पर बच्चों का नाम रखना चाहिए, नाम ऐसा हो कि बच्चे बड़े होकर अपने नाम से शर्मिंदगी महसूस न करें और अपने पैरंट्स को न कोसे, बल्कि अपने पैरेंट्स को अच्छा नाम रखने के लिए धन्य वाद कहें.

अक़ीक़ा करना,

बच्चे की पैदाइश के बाद उसका अक़ीक़ा किया किया जाना चाहिये, जो सातवें दिन होता है.और ये प्यारे नबी हज़रत मोहम्मद सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की सुन्नत है.और ये खुदाए पाक को थैंक्स कहने का बहुत ही उम्दा और अच्छा तरीक़ा है.

अक़ीक़ा क्या है.?

इंसानो को दो जीजें बहुत प्यारी होती है. माल और औलाद, और जब ये दोनों जीजें मिले तो हमें चाहिए की हम अल्लाह पाक का शुक्र अदा करें ,तो बच्चा जब पैदा होता है तो हम अल्लाह पाक का शुक्र अदा करतें है.और खुदा का शुक्र अदा करने का सब से बेहतर तरीक़ा हमें मजहबे इस्लाम ने बताया है की ऐसे मौके से हम लड़के की पैदाइश पर दो बकरा और लड़की की पैदाइश पर एक बकरा ज़बह करके उसके तीन हिस्से लगाएं,एक हिस्सा अपने लिये,दूसरा दोस्तों पड़ोसियों,और तीसरा हिस्सा गरीबों को बांटें. या फिर सबको बनाकर खिलायें.और यह सात दिन के अंदर कर लेना सुन्नत है. वरना जब चाहें कर सकते है. और इसी मौके से बच्चे का नाम भी रखलें. इसी को अक़ीक़ा कहते है.

कहीं भी हो सकता है अक़ीक़ा,

अक़ीक़ा के लिए कोई ख़ास जगह फिक्स नहीं है.बच्चे का अक़ीक़ा आप कहीं भी करा सकते है. आप का उस जगह पे रहना कोई ज़रूरी नहीं है. आप जहाँ अक़ीक़ा करना चाहते है करें.. आप बच्चे एवं पैरेंट्स का नाम भेजदे क्यों की अक़ीक़ा की दुआओं में बच्चे और उसके माता या पिता का नाम लेना ज़रूरी होता है. अगर सात दिनों के अंदर अक़ीक़ा न हो सके तो ज़िन्दगी में कभी भी किसी भी उम्र में अक़ीक़ा करा सकते है.

जुड़वा बच्चों के अक़ीक़ा के लिए  कितने बकरे का इस्तेमाल करना होगा ?

मसला वही है लड़के में दो और लड़की में एक।  अब चाहे बच्चे जुड़वा या बगैर जुड़वाँ पैदा हुआ हो. लेकिन यह भी आप के इनकम के ऊपर निर्भर है. इस्लाम ने हमें बहुत सहूलियत दी है.अगर इनकम ठीक ठाक है तो बेहतर वरना लड़के में भी एक कर सकते है और अगर आप के पास माल कुछ भी नहीं है तो आप नहीं भी कर सकते है. जब हो जाये तो कीजिये वरना मत कीजिए। 

क्या अक़ीक़ा करने के लिए ज़कात के पैसे का उपयोग कर सकता हूँ?

ज़कात के पैसे से क्या मुराद है ? एक ये कि किसी ने आप को ज़कात दिया है. या फिर आप किसी को ज़कात न देकर उसी पैसे से अक़ीक़ा करना चाहते है > दोनों सूरत में जायज नहीं है.आप अक़ीक़ा में ज़कात के पैसे का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं. ज़कात का माल  सिर्फ और सिर्फ गरीबों का है. आप उस पैसे का इस्तेमाल कही भी नहीं कर सकते। और अक़ीक़ा करने या कराने  के लिये साहेबे निसाब होना ज़रूरी है. जो साहेबे निसाब नहीं उसके लिए अक़ीक़ा ज़रूरी नहीं. सिर्फ बच्चे का नाम रखदे और जिस तरह हो सके खुदा का शुक्र अदा करें.

 मैं अपने बच्चों के अकीका समारोह का जश्न मनाने के लिए जिम कॉर्बेट में अपने अतिथि को आमंत्रित करना चाहता हूं

इस के लिए हमें आज़ादी है. जहाँ चाहें अक़ीक़े की महफ़िल सजा सकते है. जहाँ चाहें अपने दोस्तों और मेहमानो को इन्वाइट कर सकते है बस कुछ चीजों का ख्याल रखना है। जहाँ आप अक़ीक़े की महफ़िल सजा रहे है वह जगह किसी दुसरे की न हो, क्योंकि बगैर इजाज़त किसी दुसरे की कोई भी चीज़ इस्तेमाल करने को हमारे मज़हब ने मना किया है. यहाँ तक की हम बिगैर इजाज़त किसी की ज़मीन पर नमाज भी नहीं पढ़ सकते. अगर पढ़ लिया तो नमाज़ नहीं हुई. और दुसरे ये की हमें हमारे मज़हब ने फ़ुज़ूल खर्ची से मना किया है. कि फ़ुज़ूल खर्च इंसान शैतान का भाई होता है. इस लिए फ़ुज़ूल खर्ची से बचना ज़रूरी है. 

अगर बच्चे के पिता के पास पैसे नहीं हैं तो अक़ीक़ा के लिए क्या करें?

प्रश्न पुछा गया है की अगर बच्चे के बाप के पास  पैसे नहीं है तो वह अक़ीक़ा के लिए क्या करे. एक दूसरा सवाल है कि,,,क्या कोई सुन रहा है मेरे पास अकीक़ा के लिए पैसे नहीं हैं कुरान या इस्लामी कानून के अनुसार मैं क्या कर सकता हूँ?

उत्तर, दोनों प्रश्नो के एक ही उत्तर हैं कि अक़ीक़ा या क़ुरबानी यह साहिबे निसाब (मालदार)पर है, गरीबों पर क़ुर्बानी या अक़ीक़ा वाजिब नहीं. क़ुर्बानी को मैंने इस लिए शामिल कर दिया की दोनों का एक ही मसला है. इस लिए जिन के पास पैसे नहीं हैं उनको घबराने या परेशां होने की ज़रूरत नहीं इस से कोई गुनाह नहीं होगा. ज़िन्दगी के किसी भी मोड़ पर पैसे हो जाएँ करलें वरना न कराये.





 

 

 

 

 

 

 

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