उर्दू ग़ज़ल
मैं रोऊँ न कैसे जुदा हो गया है
सनम मेरा मुझ से खफा हो गया है.
अभी उसने मिलने का वादा किया था.
खुदा जाने जाके कहाँ सो गया है.
न आँखों में आंसू ,न लब पे हंसी है,
खुदारा बताओ ये क्या हो गया है.
कोई नामा बर हो तो पैग़ाम भेजूँ ,
मैं तनहा इधर हूँ , जहाँ सो गया है.
हिफाज़त से रक्खा था पहलू में दिल को.
न जाने अभी वो कहाँ खो गया है.
कठिन है ये रिज़वान ,मोहब्बत की राहें।
न लौटा कभी वो उधर जो गया है.
प्रश्न था ग़ालिब ग़ज़ल न0 2
पेश है उत्तर,
मिर्ज़ा असदुल्लाह खान ग़ालिब ने जब ग़ज़ल लिखना शुरू किया तो
उनके अशआर उर्दू और फ़ारसी के मिले जुले हुआ करते थे. और शुरुआत में उन्हों ने
अपना तखल्लुस असद रखा, बाद में वह ग़ालिब लिखने लगे दीवाने ग़ालिब के मुताबिक
यह उनकी दूसरी
ग़ज़ल है.
ग़ज़ल न0 2
सौदाए इश्क़ से दम सर्द कशीदा हूँ.
शाम ख्याले ज़ुल्फ़ से सुबह दमिदा हूँ.
दौराने सर से गर्दिशे सागर है मुत्तसिल,
खमखानाये जुनू मे दिमाग़ रसीदा हूँ.
की मुत्तसिल सितारा शुमारी में उम्र सर्फ़ ,
तस्बीह अश्क बारे ज़मज़ागाँ चैकीदा हूँ.
ज़ाहिर है मेरी शक्ल से अफ़सोस के निशां
ख़ारे अलम से पुश्त बदनदान ग़ज़ीदा हूँ.
जूं बूए गुल हूँ गर चे गिराँ बार मुश्त ज़र
लेकिन असद बवक़्ते गुज़श्तन ज़रीदा हूँ.
गुज़ारिश.
लेख पसंद आये तो ब्लॉग
को फॉलो करना न भूलें.
शुक्रिया. रिज़वान अमानी सेल्फ स्टोरी.
0 Comments
Hello guys, let me know how the post is. And do share it among your friends. Thank you,
हेलो दोस्त , पोस्ट कैसी लगी ज़रूर बताएं, और अपने दोस्तों में ज़रूर शेयर करदें. धन्यवाद I