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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 19

 


                     अपने बारे में कुछ बातें — भाग 19
                    The Final Story of the Transfer
विदाई का वह दिन

आज मेरा मध्य विद्यालय कुसुम्हारा, बिक्रमगंज, जिला रोहतास में आख़िरी दिन था। आज मेरी रवानगी थी।
आज से पाँच साल पहले का वह दिन मुझे आज भी याद है, जब योगदान देने के लिए मैंने इस विद्यालय में कदम रखा था। और आज स्थानांतरण के कारण इसी स्कूल से मेरी विदाई हो रही थी।
उस दिन भी मेरी आँखों में आँसू थे और आज भी मेरी आँखों में आँसू हैं।
उस दिन मेरी आँखों से आँसू इसलिए जारी थे कि मैं अपने घर से दूर हो रहा था। बाल-बच्चों से जुदा हो चुका था और अपनों को छोड़कर परायों के बीच आ गया था। दिल में एक ख़ौफ़ समाया हुआ था, एक डर था।
बहुत सारे सवाल दिल में थे—पता नहीं गाँव कैसा होगा? लोग कैसे होंगे?
मैं रोया था... बहुत रोया था। तनहा और अकेला रोया था।
लेकिन आज, जब मैं विदा हो रहा हूँ, तो यह क्या?
आज तो पूरा स्कूल रो रहा है।
चारों ओर ख़ामोशी का माहौल है। प्यार करने वाले शिक्षकों के चेहरे उदास हैं। एमडीएम बनाने वाले रसोइयों की आँखों से आँसू छलक रहे हैं।
उदास पेड़

ये सफ़ेदा का मोटा पेड़, जिसके साये में मैं अपनी बाइक खड़ी करता था, आज ऐसा लगता है जैसे वह पेड़ भी उदास है।
बिल्कुल ख़ामोश खड़ा है।
लगता है, अब उसकी डालियों और पत्तों से भी आँसू टपक पड़ेंगे।
छठी कक्षा, जिसका मैं क्लास टीचर हूँ, उस वर्ग के बच्चे तो दहाड़ें मार-मारकर रोने लगे—
“प्लीज़ सर! हमें छोड़कर मत जाइए सर...!”
“ये देखिए सर, आज हम लोग पूरा होमवर्क करके लाए हैं...!”
बच्चों की दर्द भरी आवाज़ मेरे कानों में गूँज रही थी—
“प्लीज़ सर, ऐसा मत कीजिए... हमें छोड़कर मत जाइए!”
बच्चों ने चारों तरफ़ से मुझे घेर लिया।
मैं क्या, मेरी जगह कोई पत्थर-दिल इंसान भी होता, तो बच्चों की इन प्यारी और दर्द भरी आवाज़ों को सुनकर रो देता।
मेरा दिल बच्चों की आवाज़ों से फटा जा रहा था।
ख़ूबसूरत काग़ज़

मोहब्बत भी क्या चीज़ होती है!
इसके भी कितने रूप होते हैं।
माँ-बाप से मोहब्बत का रूप अलग होता है। भाई-बहन से मोहब्बत का रूप अलग होता है। बीवी और बाल-बच्चों से मोहब्बत का रूप अलग होता है।
लेकिन शिक्षक और छात्र के दरमियान जो मोहब्बत और लगाव होता है, उसकी ख़ुशबू और एहसास ही अलग होते हैं।
इसीलिए कहा जाता है कि मोहब्बत एक ऐसा ख़ूबसूरत शब्द है, जिसे ख़ूबसूरत हाथों ने ख़ूबसूरत काग़ज़ पर अति सुंदर पेन से लिखा है।
हेड सर ने मेरी मदद की। वे आगे बढ़े, बच्चों को समझाया और फिर मेरा हाथ पकड़कर मुझे ऑफिस में ले गए।
स्कूल के सारे बच्चे ऑफिस के गेट पर जमा हो गए।
ऐसा लगता था जैसे आज वे जी भरकर मुझे देख लेना चाहते हों।
मेरी हालत ऐसी थी कि मैं ख़ूब गला फाड़-फाड़कर रोना चाहता था। मैं अपने छात्रों से बहुत कुछ कहना चाहता था, परंतु एक शब्द भी मेरे मुँह से नहीं निकल पा रहा था।
एक-एक बच्चे को गले से लगाकर रोना चाहता था, लेकिन मैं अपने होंठों पर ग़म का पैबंद लगाए बैठा रहा और मेरे मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।

ये कैसा दर्द है?

जब मैं यहाँ आया था, तो सब लोग पराये और अनजाने लग रहे थे।
और जब पाँच साल बाद इन्हीं लोगों से जुदा हो रहा हूँ, तो दिल फटा जा रहा है। कलेजा मुँह को आ रहा है। आँखों से अश्कों के सैलाब बहने के लिए बेताब हैं।
आख़िर ऐसा क्यों होता है?
कुछ लोग ऐसे क्यों होते हैं कि शुरू में तो इतने अच्छे नहीं लगते, लेकिन बाद में जब उनकी शख्सियत की गिरहें खुलती हैं, उनकी क़ाबिलियत और इंसानियत का पता चलता है, तो एक अनजानी-सी मोहब्बत दिल में बैठती चली जाती है।
बर्दाश्त से ज़्यादा बोझ

उस जगह से, उस जगह के लोगों से आख़िर इतनी मोहब्बत और इतना लगाव क्यों हो जाता है कि जब छोड़ने का समय आता है, तो दिल में एक टीस-सी उठती है, एक दर्द पैदा होता है?
ख़ैर, यह दर्द तो सिर्फ़ जगह बदलने पर होता है। एक जगह से दूसरी जगह जाने पर होता है।
लेकिन जब इंसान की मौत होती होगी और अपनी आत्मा को अपने जिस्म से निकलते देखता होगा... हमेशा के लिए जब इस दुनिया को छोड़ना होता होगा... तो उसे कितनी तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ता होगा?
उसे कितनी तकलीफ़ बर्दाश्त करनी पड़ती होगी!
हमें तो सब्र सिर्फ़ इसलिए हो जाता है कि ख़ुदा इंसान को बर्दाश्त से ज़्यादा बोझ नहीं देता।
सारे शिक्षक ख़ामोशी से बैठे थे। बच्चे और रसोइयों की भीड़ ऑफिस के गेट पर जमा थी।
हेड सर मेरी काग़ज़ी कार्रवाई मुकम्मल कर रहे थे।
वो स्कूल, जिसके बच्चों के शोर से पूरा विद्यालय गूँजता था, आज सब साँस रोके खड़े थे। किसी के साँस लेने तक की आवाज़ नहीं आ रही थी।
काग़ज़ात मुकम्मल हो चुके थे।
हेड सर ने वे काग़ज़ात मेरे हाथों में थमा दिए।
मैंने काग़ज़ात को सँभालकर पकड़ा, उन्हें मोड़कर जेब में रखा और फिर बड़ी मुश्किल से अपनी कुर्सी से उठा।
दोनों हाथ जोड़कर चारों तरफ़ निगाहें फैलाते हुए सिर्फ़ इतना बोल सका—
“आप लोग मेरी ख़ताओं को माफ़ करना।”
और बड़ी तेज़ी से नज़रें झुकाए ऑफिस से निकल गया।
आह! मध्य विद्यालय कुसुम्हारा

ओह! मध्य विद्यालय कुसुम्हारा के पेड़-पौधों...
सफ़ेदा के लंबे-लंबे दरख़्तों...
बरगद के चौड़े-चपटे, सायेदार पेड़ों...
मैंने तुम्हारे साये में अपनी ज़िंदगी के पाँच साल बिताए हैं।
तुम्हारे ठंडे साये में बैठकर आराम किया है।
आज मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है।
मैं अब तुमसे जुदा हो रहा हूँ।
कोई पूछे तो कहना—
“मुसाफ़िर तो गया...”
 ज़रूरी गुज़ारिश _ 

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