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दरभंगा से सासाराम स्कूल नियुक्ति की कहानी-भाग 2




 कुछ अपने बारे में – भाग 2

एक नई मंज़िल की ओर पहला सफ़र

आज दिनांक 02.02.2012 है।

यह सोचकर ही मेरे दिल में एक अजीब-सी गुदगुदी होने लगती थी कि शायद यह तारीख मेरे भविष्य को एक नई दिशा देने वाली है।
कहते हैं कि 2 फरवरी को जन्म लेने वाले लोगों में कल्पनाशक्ति और भावनात्मक समझ अच्छी होती है। ऐसे लोग संवेदनशील, शांत, सहयोगी, साहसी और भावुक स्वभाव के होते हैं। वे दूसरों की मदद करने और अपने प्रियजनों के प्रति समर्पित रहने वाले होते हैं। पढ़ाई या रचनात्मक कार्यों में उनकी कल्पना और अभिव्यक्ति अच्छी हो सकती है। हाँ, कभी-कभी अधिक संवेदनशील होने के कारण छोटी-छोटी बातें भी उन्हें दिल पर लग जाती हैं।
मेरा जन्म 2 फरवरी को तो नहीं हुआ था, लेकिन मेरे जीवन में यह तारीख एक नई शुरुआत लेकर आने वाली थी।
रोज़गार की तलाश में जहाँ अब तक भटक रहा था, अब लगता था कि मेरी परेशानियाँ दूर होने वाली हैं। ज़िंदगी को एक नई मंज़िल और एक नई दिशा मिलने वाली थी।
उस समय मैं बिहार के उस जिले में था, जिसे “चावल का कटोरा” कहा जाता है—शेरशाह सूरी की नगरी सासाराम, जिला रोहतास, बिहार।
मुझे बिक्रमगंज प्रखंड के ग्राम कुसुम्हारा स्थित मिडिल स्कूल में उर्दू शिक्षक के पद पर योगदान देने जाना था।
सासाराम से बिक्रमगंज की दूरी लगभग 40 किलोमीटर थी और बिक्रमगंज से कुसुम्हारा गाँव करीब 8 किलोमीटर दूर था। कुसुम्हारा के पूरब और पश्चिम में दो छोटे-छोटे शहर थे—पूरब में सूर्यपुरा और पश्चिम में नटवार।

बस का वह सफ़र

मैं जिस बस में सवार हुआ, उसमें काफी भीड़ थी। बस के अंदर पैर रखने तक की जगह नहीं थी। लोग एक-दूसरे से लगभग चिपककर खड़े थे।
अब मैं क्या करता?
मुझे जल्द से जल्द अपनी मंज़िल तक पहुँचना था। इसलिए किसी तरह उसी भीड़ भरी बस में सवार हो गया।
नतीजा यह हुआ कि पूरे 40 किलोमीटर तक मुझे खड़े होकर ही सफ़र करना पड़ा।
बस के हिचकोलों के साथ-साथ मेरे दिल में भी अजीब-सा हिचकोला उठ रहा था। मन में तरह-तरह के सवाल उमड़ रहे थे—नया स्कूल कैसा होगा? वहाँ के शिक्षक कैसे होंगे? लोग मुझे किस तरह स्वीकार करेंगे? अनजान जगह पर मेरा जीवन कैसा होगा?
पसीने से तर-बतर, किसी तरह मैं बिक्रमगंज पहुँचा और वहाँ से नटवार के लिए आगे बढ़ा।

पैदल यात्रा

अब नटवार से मुझे पैदल ही कुसुम्हारा जाना था, क्योंकि वहाँ से कुसुम्हारा के लिए कोई सवारी नहीं जाती थी।
अपने दो हल्के-फुल्के सामानों को कंधे और हाथों में लटकाए मैंने अपनी पैदल यात्रा शुरू कर दी।
रास्ता थोड़ा कठिन था। आड़े-तिरछे रास्तों और पगडंडियों से गुजरते हुए मेरे मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे।

स्कूल कैसा होगा?
वहाँ के शिक्षक किस प्रकार के होंगे?
मैं इस अनजान जगह पर लोगों का सामना किस तरह करूँगा? 

लेकिन कहते हैं न—“Education is a person's strength. An educated person is not afraid of anyone, anywhere.”

शिक्षा इंसान को आत्मविश्वास देती है। शायद इसी विश्वास ने उस समय मेरे अंदर भी एक अजीब-सा हौसला और हिम्मत पैदा कर दी थी।
मैं आगे बढ़ता गया।
मंज़िल दिखाई दी 
आखिरकार जैसे ही स्कूल नज़र आया, मेरा दिल खुशी से मचल उठा।मैं जल्द से जल्द विद्यालय में प्रवेश करना चाहता था। मैंने अपने कदम और तेज़ कर दिए।मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था। थकावट से बदन चूर-चूर हो रहा था, लेकिन फिर भी मन में एक ही उत्साह था कि किसी तरह यह मुश्किल रास्ता जल्द से जल्द पूरा हो जाए।फरवरी का महीना था, लेकिन उस दिन की गर्मी ने मुझे जून-जुलाई की गर्मी का एहसास करा दिया था।आखिरकार मैं विद्यालय पहुँच गया।विद्यालय में प्रवेश करते ही मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। स्कूल बड़ा और बेहद खूबसूरत था।मेरे मन में एक संतोष था कि जिस मंज़िल की तलाश में मैं इतने दिनों से भटक रहा था, शायद अब वह मंज़िल मेरे सामने थी।

एक शिक्षक की मदद

यह एक मिडिल स्कूल था और इसके बिल्कुल नज़दीक ही हाई स्कूल भी था।
जैसे ही मैंने स्कूल में कदम रखा, एक नए आदमी को सामानों से लदा हुआ आते देखकर सभी शिक्षक आपस में सरगोशियाँ करने लगे।
मैं प्रधानाध्यापक महोदय की अनुमति से कार्यालय में दाखिल हुआ। बड़ी इज़्ज़त के साथ मुझे कुर्सी दी गई और फिर पानी पेश किया गया।
शिक्षकों के व्यवहार से मेरे दिल को काफी इत्मीनान हो रहा था।
कुछ देर की खामोशी के बाद प्रधानाध्यापक महोदय ने मेरे आने का कारण पूछा। इसके बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।
विद्यालय के शिक्षक बहुत अच्छे और मीठे बोलने वाले थे। उनकी भाषा भोजपुरी थी।
भोजपुरी भाषा बहुत ही मीठी भाषा है। पहली बार मैं इतने करीब से भोजपुरी सुन रहा था। ऐसा लग रहा था मानो कोई मेरे कानों में रस घोल रहा हो।
शिक्षकों ने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया और मेरी भरपूर मदद की। मुझे भी उनकी भाषा और उनके व्यवहार से अपनापन महसूस होने लगा।
देखते ही देखते मैं भोजपुरी भाषा समझने और बोलने भी लगा।
स्कूल ज्वाइन करने के बाद अब मेरे सामने एक और समस्या थी—रहने की व्यवस्था कहाँ होगी?
लेकिन यह समस्या भी बहुत जल्द हल हो गई।
उसी स्कूल में एक शिक्षक थे—मोहम्मद मंसूर आलम।
उन्होंने उसी दिन बड़े अपनापन के साथ मुझे अपने घर ठहरने की पेशकश की।
और इस तरह, जिस अनजान जगह पर मैं कुछ घंटे पहले अकेला और अनिश्चितता से भरा हुआ पहुँचा था, वहीं मुझे एक ऐसा इंसान मिल गया जिसने मुझे अपने घर में जगह देकर यह एहसास करा दिया कि अनजान जगह पर भी अपने मिल जाते हैं।
उस दिन का सफ़र केवल एक नौकरी तक पहुँचने का सफ़र नहीं था।
वह मेरे जीवन की एक नई शुरुआत थी।
मेरी ज़िंदगी में आगे क्या-क्या हुआ, वहाँ के लोगों से मेरा रिश्ता कैसे बना और उस गाँव में मेरे जीवन के कौन-कौन से यादगार अध्याय लिखे गए—
यह सब पढ़िए “कुछ अपने बारे में” के तीसरे भाग में।
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