मेरे सफ़र की दास्तान — भाग 1
लोआम से सासाराम तक
जब मैंने होश संभाला, तो खुद को एक मदरसे के विद्यार्थी के रूप में पाया। वह मदरसा मेरे अपने गांव में ही था—मदरसा इस्लामिया अमानिया, लोआम।
लोआम, बिहार के दरभंगा ज़िले का एक मशहूर गांव है। यह गांव मुस्लिम बहुल आबादी वाला है, लेकिन इसकी सबसे खूबसूरत बात यहां की गंगा-जमुनी तहज़ीब रही है। गांव की गोद में कई मस्जिदों के साथ मंदिर भी हैं और यहां हिंदू-मुसलमान लंबे अरसे से आपसी प्रेम और भाईचारे के साथ रहते आए हैं। मेरे ज्ञान और अनुभव के अनुसार यहां कभी किसी बड़े धार्मिक विवाद या फसाद ने उस भाईचारे को प्रभावित नहीं किया।
गांव की अपनी एक अलग पहचान है। यहां मैथिली के साथ हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी भी बोली और समझी जाती है। इसी मिट्टी, इसी माहौल और इसी सादगी के बीच मेरा बचपन गुज़रा।
मेरा जन्म इसी गांव के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। मेरे पिता ने बड़े प्यार और दुआओं के साथ मेरा नाम हसन सिद्दीकी मोहम्मद रिज़वानुल्लाह रखा, जो आगे चलकर सिर्फ़ मोहम्मद रिज़वानुल्लाह रह गया।
मेरे पिता भी उसी मदरसे में शिक्षक थे। शायद यही वजह थी कि मेरी ज़िंदगी के शुरुआती पन्ने किताबों, तालीम और मदरसे के माहौल से ही लिखे जाने लगे।
तालीम का सफ़र
बचपन से ही पढ़ाई मेरी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गई। मैंने मदरसे में पढ़ते हुए हिफ़्ज़ की तालीम मुकम्मल की। इसके बाद बिहार मदरसा बोर्ड, पटना से मैंने अलग-अलग शैक्षिक मराहिल तय किए—वास्तानिया, फौकानिया, मौलवी और आलिम की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद मैंने फ़ाज़िले उर्दू और फ़ाज़िले फ़ारसी की डिग्रियां हासिल कीं। आगे बढ़ने की चाह ने मुझे रुकने नहीं दिया। मैंने मिल्लत टीचर ट्रेनिंग कॉलेज, मधुबनी, बिहार से बी.एड. की पढ़ाई भी पूरी की।
शायद उस समय मुझे खुद भी अंदाज़ा नहीं था कि यह तालीम आगे चलकर मेरी ज़िंदगी की दिशा तय करने वाली है।
नौकरी की तलाश और इंतज़ार
तालीम पूरी करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती रोज़गार की थी।
डिग्रियां हाथ में थीं, लेकिन नौकरी हाथ नहीं आ रही थी। रोज़गार की तलाश में दर-दर की ठोकरें खाना अपने आप में एक अलग इम्तिहान होता है। इंसान जितना बाहर से मजबूत दिखाई देता है, अंदर से उतना ही सवालों से घिरा होता है—आख़िर कब तक इंतज़ार करना होगा? मेरी मेहनत का फल कब मिलेगा?
इसी इंतज़ार के बीच वर्ष 2007 में मेरी नियुक्ति जे.एन.जे.वी. हाई स्कूल, नवादा में हुई। यह मेरे लिए ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
इसके बाद बिहार सरकार द्वारा 34,540 शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया में मेरा नाम भी आया और आखिरकार वर्ष 2012 में मैंने मिडिल स्कूल में अपनी सेवा ज्वाइन कर ली।
एक लंबा इंतज़ार ख़त्म हुआ था।
जिस शख़्स ने कभी अपने भविष्य को लेकर कई सवालों का सामना किया था, अब उसके सामने शिक्षक के रूप में एक नई ज़िंदगी थी।
(मदरसा इस्लामिया अमनिया लोआम
लिखने का शौक
लिखने का शौक
मैं कोई बहुत बड़ा लेखक होने का दावा नहीं करता। लेकिन बचपन से ही मुझे लिखने का शौक रहा है। कहानी, अफ़साना, निबंध, मज़ामीन, ग़ज़ल और कविता—इन सबने मुझे हमेशा अपनी ओर आकर्षित किया।
शायद शब्दों से मेरा रिश्ता भी उसी दौर में बना, जब मैं मदरसे की किताबों के बीच बैठकर अपनी दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा था।
समय के साथ मेरे जीवन में बहुत से ऐसे अनुभव आए जिन्हें सिर्फ़ अपने तक सीमित रखना मुझे अच्छा नहीं लगा। खासकर दरभंगा से सासाराम जाकर नौकरी ज्वाइन करने की मेरी कहानी अपने आप में एक अलग किस्सा है।
इसीलिए मैंने सोचा कि क्यों न अपने इस सफ़रनामे को ब्लॉग के माध्यम से अपने दोस्तों और पाठकों के साथ साझा किया जाए।
मैं यह नहीं जानता कि मैं अपनी इस कोशिश में कितना कामयाब हो पाऊंगा। लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि यह मेरी अपनी कहानी है—मेरी ज़िंदगी के अनुभवों, संघर्षों, उम्मीदों और यादों से बनी हुई।
अब फैसला आपको करना है।
नियुक्ति रोहतास ज़िले में
मेरी नियुक्ति बिहार के रोहतास ज़िले के बिक्रमगंज प्रखंड के मिडिल स्कूल कुसुम्हारा में हुई।
मेरे लिए यह सिर्फ़ एक नौकरी नहीं थी। यह मेरे जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत थी।
अब मुझे दरभंगा छोड़कर रोहतास ज़िले के सासाराम की ओर जाना था।
मैं दरभंगा से बस के ज़रिये पटना पहुंचा। पटना से सासाराम जाने वाली कई बसें थीं। मैंने भी बस का ही सहारा लिया।
रात के लगभग 11 बजे पटना से बस सासाराम के लिए रवाना हुई। रात का सफ़र शुरू हो चुका था। बाहर अंधेरा था और बस अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी।
मेरे लिए यह सफ़र केवल दरभंगा से सासाराम तक की दूरी तय करना नहीं था।
यह मेरे जीवन के एक पुराने अध्याय से निकलकर एक बिल्कुल नए अध्याय में प्रवेश करने का सफ़र था।
रात बीतती रही और आखिरकार सुबह लगभग 5 बजे बस सासाराम पहुंच गई।
मैं एक अनजान जगह पर था, लेकिन दिल में एक नई उम्मीद थी—अब मुझे अपनी नई ज़िम्मेदारी निभानी थी।
सासाराम की वह सुबह आज भी मेरी यादों में एक अलग जगह रखती है।
मेरे सफ़र की असली कहानी तो अब शुरू हुई थी...
जारी है — भाग 2 में पढ़िए: सासाराम पहुंचने के बाद के दिन, नई जगह, नई नौकरी और मेरे जीवन के वे अनुभव जिन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया।
गुज़ारिश
अगर मेरी यह दास्तान आपको पसंद आए, तो अपनी राय ज़रूर साझा कीजिए। आपके सुझाव और मोहब्बत ही मेरी इस कोशिश को आगे बढ़ाने की ताक़त हैं।
ज़रूरी गुज़ारिश _
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Email. hmrizwanamani@gamil.com



2 Comments
Very good
ReplyDeleteMasha Allah baht khoob
ReplyDeleteHello guys, let me know how the post is. And do share it among your friends. Thank you,
हेलो दोस्त , पोस्ट कैसी लगी ज़रूर बताएं, और अपने दोस्तों में ज़रूर शेयर करदें. धन्यवाद I