बहुत दिन पहले मैंने एक मैगज़ीन में मजाकिया नज़्म पढ़ा था जिसमे मौलवी का खूब मजाक उड़ाया गया था.
जैसे, मौलवी निकाह पढ़ाये हमें मंज़ूर मगर,,, मौलवी निकाह रचाये हमें मंजूर नहीं।
उसी के जवाब में मैंने भी कुछ मजाकिया अशआर कहे थे जो आप की खिदमत में पेश है.
कुछ मज़ाहिया अशआर
कलमा उन को जो पढायें,,,तो मरे नानी उन की।
याद उक़्बा (मरने के बाद) जो दिलाए तो मरे नानी उन की.
खुद तो धुवें से बने गाड़ी का इंजन यारो
मौलवी पान भी खाये,,,तो मरे नानी उन की.
रोज़ निकले वो बाजार में बनके छक्का
दाढ़ी सुन्नत है बतायें,,,तो मरे नानी उनकी
मोटे इतने कि परेशान है अहले खाना(घरवाले)
मौलवी सेहत बनाये तो मरे नानी उनकी
देख कर नाच बड़े शौक से कटे वो उम्र
उनको जलसे में बुलाये,,,तो मरे नानी उनकी
प्रश्न है.
Ajeeb shakes hai paani ke ghar mein rahta hai ki poori ghazal.
उत्तर,
वो अक्स बनके मेरी चश्मे तर में रहता है
अजीब शख्स है पानी के घर में रहता है.
वही सितारा शबे गम एक
सितारा है
वो एक सितारा जो चश्मे सहर में रहता है.
खुली फ़ज़ा का प्यामी हवा का बासी है
कहाँ वो हल्क़ये दीवारो
दर में रहता है.
जो मेरे होंटो पे आये तो गुनगुनाऊँ उसे
वो शेर बनके ब्याजे नज़र में रहता है.
गुज़रता वक्त मेरा गमगुसार क्या होगा
ये खुद तआक़ुब शामो सहर में रहता है.
मेरा ही रूप है तू ग़ौर से अगर देखे
बगुला सा जो तेरी रह गुज़र में रहता है.
न जाने कौन है जिसकी तलाश में
हर एक सांस मेरा अब सफर में रहता है.
बिस्मिल साबरी
गुज़ारिश.
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शुक्रिया. रिज़वान अमानी सेल्फ स्टोरी.
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